#जीवनसंवाद: बूढ़ा मन!

#जीवनसंवाद: बूढ़ा मन!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: शरीर का बूढ़ा होना नैसर्गिक है. स्वाभाविक है. लेकिन मन का बूढ़ा होना गहरी चिंता की बात है. मन के बूढ़े होने की ओर हम कभी गए ही नहीं! नौजवान अगर बूढ़े मन के साथ चलेंगे तो वह खंडहर में बदल जाएंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 10, 2020, 10:20 PM IST
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शरीर का बूढ़ा होना हमने बहुत सुना है लेकिन क्या मन भी बूढ़ा होता है! मन भी तन की तरह कमजोर होने लगता है. नवीनता से डरने लगता है. छोटी जकड़न को बड़ा और पुराने को ही सब कुछ समझने लगता है. अपने आसपास जितनी अधिक गहराई से देखेंगे, पाएंगे कि मन शरीर से कहीं अधिक बूढ़े होते जा रहे हैं.

शरीर का बूढ़ा होना नैसर्गिक है. स्वाभाविक है. लेकिन मन का बूढ़ा होना गहरी चिंता की बात है. मन के बूढ़े होने की ओर हम कभी गए ही नहीं! नौजवान अगर बूढ़े मन के साथ चलेंगे तो वह खंडहर में बदल जाएंगे. पुराने मकान कितने ही प्रिय क्यों न हों, एक उम्र के बाद खंडहर को टूटना ही होता है. यह एकदम सहज है. लेकिन अगर बीस-तीस बरस के मकान खंडहर होने लगें तो क्या होगा.

हम जिनको युवा कह रहे हैं उनके मन ऐसे ही बूढ़े हो रहे हैं. मन और शरीर दोनों का बुढ़ापा अलग-अलग है. आपको देवानंद की याद होगी. देवानंद हमेशा कहते मेरा मन नया है. उनके मुंह से हमने कभी निराशा, हारने की बात नहीं सुनीं. देवानंद का मन बूढ़े शरीर के बाद भी नौजवान था. ठीक है ऐसे ही लाखों-करोड़ों नौजवानों का मन कम उम्र में बूढ़ा हो सकता है. नौजवान मन का बूढ़ा होना, जीवन की आशा का कम होते जाना खतरनाक है. संघर्ष की कमी जिजीविषा को कमजोर करती है. जीने का कोई विकल्प नहीं है, अगर यह बात मन में अच्छी तरह बैठ जाए तो जीवन के प्रति प्रेम गहरा होता है. प्रेम और स्नेह की मात्रा गहराने लगती है.



मन का बुढ़ापा कैसे नापेंगे! शरीर का तो त्वचा से पता चल जाता है. मन का बुढ़ापा पहचानना इससे भी सरल है. नए के प्रति आग्रह, साहस और अभय. जिनमें यह तीनों हैं, उनका मन कभी बूढ़ा नहीं होता! इनसे सहज पता चल जाएगा, कौन मन बूढ़ा /कौन जवान!




जीवन के प्रति नवीन दृष्टिकोण, खतरे उठाने और जोखिम सहने की इच्छा/हर हाल में लड़ना/टूट कर बिखरना नहीं/आशा के दीए का जलते रहना/नए के स्वागत के लिए तत्पर रहना/हर विचार को होश पूर्वक देखना यही तो मन का जवान होना है. बंधे हुए रास्तों पर चलने वाले लोग मन को जल्दी बूढ़ा कर लेते हैं.


महाभारत में आप इसे और अच्छी तरह समझ सकते हैं. नायक कृष्ण की जीवन दृष्टि न केवल नौजवान है, बल्कि उनके मन में भी शरीर के बूढ़े होने की छाया नहीं है. नवीनता और नई कोपलों का स्वागत करना नहीं भूलते. कृष्ण का मन नौजवान है. वह हमेशा नवीनता के प्रस्ताव लेकर आते हैं. वह युद्ध के मैदान में भी शांति गीत को नहीं भूलते.

बलराम कहते हैं हमें किसी से भयभीत होकर मथुरा से द्वारका जाने की जरूरत नहीं. बलराम का मन बूढ़ा हो गया है. जो चला रहा है, उससे आगे बलराम नहीं देख सकते. लेकिन कृष्ण के साथ ऐसा नहीं है. कृष्ण कहते हैं हमें प्रजा को आए दिन होने वाले आक्रमण से बचाना है. क्योंकि युद्ध के बीच शांति नहीं हो सकती. उसके बिना प्रगति नहीं हो सकती.

कृष्ण युवा मन से ही यह निर्णय ले रहे हैं. बूढ़ा मन वह है जिसमें अनुभव की परत, पुराना इतना जम जाए कि नया सांस न ले पाए. काश! हम अपने नायक से सहज जीवन दृष्टि ग्रहण कर पाते! जिसकी और महर्षि व्यास बार-बार संकेत करते हैं. लेकिन हम बीआर चोपड़ा की महाभारत के युद्ध प्रसंगों की स्मृति से आगे नहीं बढ़ पाते!


कृष्ण यहीं नहीं रुकते. वह अपने जीवन की रक्षा और युद्ध से बचने के लिए रणछोड़ भी हो जाते हैं. क्योंकि जीवन उनके लिए सबसे बहुमूल्य है. उनका मन नवीन है. इसीलिए, वह महानायक हैं!

हमें अपने मन को नए के लिए तैयार करना है. साहस, ऊर्जा के साथ उसे अभय करना है. जिस मन में यह तीनों होंगे वह कभी बूढ़ा नहीं हो सकता. बूढ़े मन का उम्र से कोई रिश्ता नहीं. जरा अपना ख्याल कीजिए देखिए आपका मन कितना जवान है!

शुभकामना सहित...

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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