#जीवनसंवाद : झूठा सुख!

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Jeevan Samvad: जब आप अपने दोस्तों से यह ना कह सकें कि यह आपके बस का नहीं है. तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह सही लोग नहीं हैं. मित्रता का अर्थ छुपाना नहीं है. उजागर करना है.

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अब खुशी बहुत तेजी से बदलती रहती है. कुछ बरस पहले जिसकी आरजू थी, उस पर अब कोई खुशी नहीं. पहले खुशी धीमे-धीमे बढ़ती थी. आरजू के कंधे पर बैठकर खुशी हम तक पहुंचने की कोशिश करती थी. वह धीमे-धीमे आती थी, देर तक रहती थी, रूह तक पहुंचती थी. इधर, हम पर सब कुछ बदलने का जुनून सा हो गया है. एकतरफा सोच जिंदगी को बहुत तेजी से प्रभावित करती है. बाजार ने एकतरफा सोचने, एक जैसा होने और सबके जैसा दिखने के लिए बहुत तेजी से प्रेरित किया. अलग होने और बदलती हवा के बीच डटकर खड़े रहने के लिए जिस तरह के मनोबल की जरूरत होती है, वैसा मनोबल तेजी से कम हो रहा है.

हमारे चारों तरफ एक किस्म का झूठा वातावरण तैयार हो रहा है. मैं इसे झूठा सुख (Artificial Happiness) कहता हूं. इसके अंग्रेजी अनुवाद पर अलग-अलग मत हो सकते हैं. लेकिन इसमें जानबूझकर फॉल्स ( झूठ) की जगह आर्टिफिशियल (कृत्रिम) को लिया गया है. ऐसी चीजों से सुखी होने की कल्पना कर रहे हैं, जिनका आधार ही कृत्रिम है. दूसरों की देखा-देखी हम केवल नकलची बंदर बन रहे हैं.


लखनऊ से 'जीवन संवाद' के पाठक संजय त्रिपाठी ने लिखा है कि उनके एक मित्र हमेशा अपने घर पर दूसरों को भोजन के लिए बुलाते थे. कुछ दिन बाद उन्होंने पाया कि बाकी सब तो उन्हें घर के बाहर दावत देने के लिए बुलाते हैं. इससे धीरे-धीरे उनको एहसास हुआ कि वह कुछ कमतर हैं. हर बार घर पर ही दावत देते हैं. तो उन्होंने भी बाहर दावत देनी शुरू कर दी. उनकी आमदनी बाकी लोगों के मुकाबले कम थी, इसलिए धीरे-धीरे उनके बजट पर असर पड़ना आरंभ हो गया. उनको मुश्किल में देखकर संजय ने उनसे पूछा कि उन्होंने यह फैसला क्यों किया. उन्होंने संजय से अपने मन की बात साझा करते हुए कहा, 'मुझे लग रहा था कि मैं अपने दोस्तों के मुकाबले प्रतिष्ठा और सम्मान में पीछे छूट रहा हूं. अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार मुझे भी खर्च करना चाहिए.'

संजय ने उनसे कहा, 'हम आपसे स्नेह करते हैं. आपकी दावत से नहीं. आप अपने घर पर इतने प्रेम से आयोजन करते थे उसे बंद करने की कोई वजह नहीं थी. दूसरे लोग जो ऐसा नहीं कर पाते हैं उसके अपने कारण हैं. उनकी भोजन बनाने की क्षमता सीमित हैं. अच्छे व्यंजन बनाना एक कला है उसमें सभी की महारत नहीं हो सकती.'



हमें एक-दूसरे की नकल नहीं करनी चाहिए, एक दूसरे का पूरक/साथी बनना चाहिए. इससे ही सच्ची खुशी हासिल की जा सकती है. एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश होनी चाहिए लेकिन इस शर्त पर नहीं कि दूसरे को पीछे छोड़ना है. दूसरे के साथ भी आगे बढ़ा जा सकता है. जो ऐसा कर पाते हैं, वह कभी कुंठित नहीं होते. दूसरे की प्रसन्नता और तरक्की से उनके मन में कुंठा और मैल इकट्ठा नहीं होता.


दूसरों को सुखी और प्रसन्न देखने की जीवनशैली को ही यहां 'झूठा सुख' कहा गया है. इसे हम रचते हैं. जिससे हम दूसरों के मुकाबले दिख सकें. उनकी बराबरी पर दिख सकें, जिनकी बराबरी पर दिखना चाहते हैं. इससे ही अपने दुख को भीतर की ओर से धकेलते जाते हैं. अपने से दूर दुख आत्मा में मैल की तरह बैठना शुरू कर देता है. यह बहुत ही हानिकारक स्थिति है मन की. आपके जीवन और आनंद की.


जब आप अपने दोस्तों से यह ना कह सकें कि यह आपके बस का नहीं है. तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह सही लोग नहीं हैं. मित्रता का अर्थ छुपाना नहीं है. उजागर करना है. जैसा है, वैसा दिखाना है. यह जीवनशैली है जो गहरे अभ्यास से हासिल होती है. लेकिन एक बार जीवन में आ जाए तो इससे भला कुछ नहीं.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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