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#जीवनसंवाद: दूसरे का दुख

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 5, 2019, 8:49 AM IST
#जीवनसंवाद: दूसरे का दुख
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: सुख की अंगड़ाई के बीच दूसरों के लिए थोड़ी आत्‍मीयता,स्‍नेह बनाए रखने की आदत आपके अपने लिए ही सुख रचने का काम है.

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  • Last Updated: November 5, 2019, 8:49 AM IST
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हम-दूसरे के दुख को अनदेखा करते रहते हैं. हमारे भीतर यह भाव गहरा होता है कि हमारा इससे कोई सरोकार नहीं. यह हमारे हिस्‍से की ‘धूप’ नहीं. दूसरे की चिंता में हम क्‍यों घुलें. मजेदार बात यह है कि जितना हमने सोचा होता है, संकट हमसे उतना दूर नहीं होता. वह तो हमारे समीप ही होता है. वह दूसरे के अधिक निकट होता है, इसलिए हमसे दूर दिखता है. असल में वह हमसे दूर होता नहीं. मन का भ्रम है, कि दूर है.

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से सुनैना दुबे ने हमसे एक छोटा-सा किस्‍सा साझा किया है. निहारिका लिखती हैं, ‘हम बस से कॉलेज जाते थे. जिसमें लड़के-लड़कि‍यां सब होते थे. एक दिन पीछे बैठी सीनियर लड़कियों ने शोर मचाना शुरू किया कि बस में गिरगिट है. बस में ड्राइवर के अलावा दूसरा कोई स्‍टाफ नहीं था. इसलिए, उन तक आवाज नहीं जा रही थी. मैं सहेली के साथ एकदम आगे की ओर बैठी थी. वह शोर हम तक आ रहा था. लेकिन मुझे लगा गिरगिट पीछे है, हमें क्‍या! वैसे भी सीनियर आए दिन कुछ न कुछ हंगामा किए रहती थीं. मैं अपनी सहेली के साथ गप्पें हांकती बैठी रही. इसके आधे घंटे बाद अचानक मुझे लगा कि कपड़ों के भीतर कुछ है.'

निहारिका आगे लिखती हैं, 'घबराहट के मारे बुरा हाल था. मेरे सहेली का तब तक घर आ गया, वह उतर गई. मेरा चेहरा पीला पड़ गया. समझ नहीं आ रहा था कि क्‍या किया जाए. आगे बैठा एक लड़का चेहरा देखकर मदद के लिए आगे आया तो मैंने उसे संकोच, शर्म के कारण लौटा दिया. जब घबराहट सिर चकराने में बदलने लगी तब जाकर मैंने बस के उस हिस्‍से की ओर बढ़ी, जिसमें सीनियर छात्राएं थीं. उन्‍होंने तुरंत मदद की. किसी तरह से गिरगिट को बाहर किया गया. सुनैना ने कहा, मानो गिरगिट ने मुझे सबक सिखाने का फैसला कर लिया था. यह दूसरे के दुख को अपने से दूर समझते रहने का सबसे बड़ा सबक मेरे जीवन का था.’

यह सुनैना की कहानी थी. ठहरकर सोचने पर हम पाएंगे कि
हम सब भी अपने से संकट/दुख/गिरगिट को इतना ही दूर मानते हैं. सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि हमें हमेशा लगता है कि इससे हमारा क्‍या रिश्‍ता. हम क्‍यों उन चीजों के लिए चिंतित हों, जो हम पर असर नहीं डाल रहीं. ऐसा सोचते हुए हम एक-दूसरे के लिए दुख रचते रहते हैं. दुख का बड़ा कारण यही है.


दिल्‍ली में सांसों में घुल गए प्रदूषण के बीच एक मित्र ने बताया कि दस साल पहले वह इसी मौसम में पंजाब गए. वह धुंध, धूल के बीच लोगों से पूछा कि यह क्‍या है. तक उन्‍हें बताया कि यह पराली का असर है. हर बरस की यही कहानी है. उन्‍होंने कहा, इसकी दिल्‍ली में कहीं बात नहीं होती. इस पर एक बुजुर्ग ने कहा था, देश में जब तक दिल्‍ली तक कोई चीज़ न पहुंचे, उसे समस्‍या माना ही नहीं जाता!


जिस पराली पर दिल्‍ली में इतना शोर है. वह जहां से यहां तक पहुंचती है, उसके असर के बारे में हम इतने दिनों तक मौन में क्‍यों रहे. यह वास्‍तव में दूसरे के दुख से स्‍वयं को दूर रखने की कहानी है. ऊपर, हमने गिरगिट का जो किस्‍सा सुना, वह हमारे सोच विचार के निजीकरण का किस्‍सा है. निजीकरण के दौर में हमने अपने को इतना निजी कर लिया है कि बड़ी-बड़ी कंपनियां को टक्‍कर देने लगे हैं.

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अपने सुख को दूसरे से बांटे बिना हम बहुत दिन तक उसका उपयोग नहीं कर पाएंगे. ‘वन-वे’ टैफि‍क कहीं-कहीं ही काम करता है. यह सारे शहर के लिए नहीं होता. सुख की भी यही कहानी है. इसलिए, सुख की अंगड़ाई के बीच दूसरों के लिए थोड़ी आत्‍मीयता,स्‍नेह बनाए रखने की आदत आपके अपने लिए ही सुख रचने का काम है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 4, 2019, 12:50 PM IST
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