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#जीवनसंवाद : 'सब ठीक है' के आगे!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 16, 2019, 6:02 PM IST
#जीवनसंवाद : 'सब ठीक है' के आगे!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अपने भाई, परिवार, माता-पिता, रिश्तेदार से बात किए हुए बिना हमारे दिन आसानी से बीतते रहते हैं. बहुत छोटी दुनिया में सिमटते जा रहे हैं.

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  • Last Updated: October 16, 2019, 6:02 PM IST
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हम किसी से मिलते ही पहली बात यही कहते हैं, आप कैसे हैं. कई बार हम इतनी जल्दी में होते हैं कि उसके 'ठीक है' वाले उत्तर को सुने बिना ही आगे बढ़ जाते हैं. बहुत समय नहीं हुआ, जब हम 'ठीक हैं' के साथ आगे-पीछे का पूरा हालचाल लिया करते थे. धीरे-धीरे हम 'सब ठीक है' पर सिमटते जा रहे हैं. हम दूसरों से व्यवहार करते हुए एक किस्म की दुनिया रच रहे होते हैं. हम सबके लिए जैसी दुनिया बनाएंगे, उसी दुनिया का हिस्सा तो हम भी बन जाएंगे. अकेलापन, उदासी और अवसाद बढ़ने के कारण की खोज करने जब हम निकलते हैं तो धीरे-धीरे अपने ही पास जाकर रुक जाते हैं.

कल एक दोस्त मिलने आए. मैंने पूछा, बड़े भैया कैसे हैं. उन्होंने कहा सब ठीक ही होगा. काफी दिनों से बात नहीं हुई. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ. मैंने स्पष्ट करते हुए कहा मैं आपके भैया की बात कर रहा हूं. उन्होंने कहा, हां मैं समझ गया. लेकिन मैं भी व्यस्त रहता हूं और वह भी. इसलिए कई बार बातचीत किए हुए महीनों हो जाते हैं. आपकी जानकारी के लिए बताता चलूं कि दोनों बैंकिंग सेक्टर में काम करते हैं. जहां रविवार की निश्चित रूप से और शनिवार की कुछ नियमों के साथ छुट्टी होती है. मैंने बात बदलते हुए कहा, छुट्टी के दिन क्या करते हैं? उन्होंने कहा, 'अक्सर कहीं बाहर घूमने, शॉपिंग करने और फिल्म देखने में समय बीत जाता है.'

आप समझिए, अपने भाई से बात करने का वक्त नहीं मिल पा रहा है लेकिन खरीदारी, सिनेमा और घूमने के लिए पूरा समय है. भाई हमारी प्राथमिकता सूची से बाहर हो गया है. ऐसा उन्होंने कहा नहीं, लेकिन स्पष्ट रूप से हम समझ सकते हैं.


यह अकेले उनकी कहानी नहीं है, हम सब कुछ इसी तरह की जीवन शैली रच रहे हैं. अपने भाई, परिवार, माता-पिता, रिश्तेदार से बात किए हुए बिना हमारे दिन आसानी से बीतते रहते हैं. बहुत छोटी दुनिया में सिमटते जा रहे हैं. आपको बात थोड़ी विचित्र लग सकती है लेकिन सच तो यह है कि इसी वजह से हम बहुत से पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड, कर्ज से घिरते जा रहे हैं. हमें अपनों से छोटी-छोटी जरूरत के लिए मदद मांगने में शर्म/संकोच होता है, लेकिन बैंक से नहीं. क्‍योंकि बैंक अधिक सवाल नहीं करता. पर्सनल लोन देने वाले तो मानिए, हमारे इंतजार में ही बैठे रहते हैं.

जैसे-जैसे हमारा संवाद कम होता जाता है, हम लोगों से दूर होते जाते हैं. नजरों से दूर होने पर 'नजर' से दूर होते देर नहीं लगती. इसलिए, जब कभी हमें किसी तरह के आर्थिक सहयोग की जरूरत होती है तो हम किसी की ओर देखने की हिम्मत नहीं करते. क्योंकि कोई हमारी ओर देखने की हिम्मत नहीं करता. सब एक दूसरे से ऐसे संकोच करने लगे हैं कि मानिए, किसी दूसरे देश के निवासी हैं.



खुद को हमने अपनी जरूरतों की नजर से बांध लिया है. ऐसा करते हुए हम अपने लिए एक अकेलापन बुन रहे होते है. जहां हमारे (पति,पत्‍नी और बच्‍चों) के अलावा किसी के लिए जगह नहीं है!

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इसलिए, जितना संभव हो उनसे कभी संवाद कम मत कीजिए, जिनसे आत्‍मा के तार जुड़े हैं. बचपन से सूत्र गुंथे हुए हैं. हम अपने परिवार, परिजन, रिश्‍तेदार और दोस्‍तों के साथ ही खुश हो सकते हैं. हमारी खुशी तब तक अधूरी है, जब तक उसके हिस्‍सेदार नहीं हैं. यह हिस्‍सेदार संवाद की कमी से छिटक रहे हैं. ऐसे सभी लोगों से जो आपकी जिंदगी की धुरी हैं. सहायक धुरी हैं, उनमें निरंतर स्‍नेह, प्रेम और आत्‍मीयता का निवेश करते रहिए. किसी और के लिए नहीं, अपने लिए. अपने जीवन को खुशमय, आनंदित और स्‍नेहिल बनाए रखने की दिशा में इससे बढ़कर कुछ और काम नहीं है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: October 16, 2019, 10:14 AM IST
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