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#जीवनसंवाद: अपने मन से दूर!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 13, 2020, 1:24 PM IST
#जीवनसंवाद: अपने मन से दूर!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: संवाद जितना परिवार, दोस्तों से जरूरी है, उतना ही स्वयं से भी. खुद को सही समय पर मन को समझाना, पोषण देना जीवन के सबसे जरूरी काम में शामिल कीजिए. इससे स्वयं को बहुत से संकटों से आसानी से बचाया जा सकता है.

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  • Last Updated: February 13, 2020, 1:24 PM IST
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हम सब इस समय बहुत अधिक व्यस्त हैं. किसी के पास समय नहीं है. दूसरों के लिए समय की कमी फिर भी समझ में आती है लेकिन अपने लिए ही समय न मिलना, यह बताता है कि कुछ है, जिसे पकड़ने की कोशिश होनी चाहिए. सबसे अधिक समय उसके पास होता है जो सबसे अधिक व्यस्त होता है. सबसे कम समय उसके पास होता है, जिसके पास कम व्यस्तता होती है. कुछ छोटे-छोटे उदाहरण हमें अपने आसपास इस बारे में दिखते रहते हैं. लेकिन अक्सर हम उनकी ओर स्नेह से देखते ही नहीं. हम खुद को झूठी सहानुभूति और मन की बहानेबाजी में लपेटे रहते हैं.

थोड़ा सोच कर देखिए जब भी आप किसी से समय मांगते हैं तो किस तरह के जवाब मिलते हैं. अगर आप किसी बहुत अधिक सफल और व्यस्त व्यक्ति से मिलना चाहते हैं, तो वह एक मिनट के भीतर आपको समय दे देते हैं. जबकि इसके उलट जिस व्यक्ति के पास काम कम होता है अक्सर वह मिलने के लिए समय नहीं निकाल पाता. यह बात कहते हुए मैंने अपने जीवन में अब तक मिले सभी व्यक्तियों के औसत व्यवहार को ध्यान में रखा है. हम जितने व्यस्त होते जाते हैं, उतने ही व्यवस्थित भी. इसीलिए, हमारे आसपास ऐसे लोगों की संख्या कम है, जिनके पास खूब सारा समय हो. असल में समय उसके ही पास है, जिसने इसे सहेज लिया.

आज का संवाद मन से दूरी पर है. तो इसमें समय कहां से आ गया? समय इसलिए आया क्योंकि समय न मिल पाने के कारण ही तो यह दूरी है. हम खुद को सहेजना भूलते जा रहे हैं. इससे मन से दूरी बढ़ती जा रही है. इस दूरी से तनाव पैदा हो रहा है, जो पेट में रक्त और ऑक्सीजन के प्रवाह में कमी, आंतों के बैक्टीरिया में असंतुलन और आंतों में सूजन तक का कारण बन रहा है.


डॉक्टर बता रहे हैं कि तनाव लेने की आदत सेहत पर निरंतर विपरीत प्रभाव डाल रही है. इससे सबसे अधिक, आसानी से हमारा पाचन तंत्र प्रभावित होता है. तनाव हमारी पाचन क्रिया को इतना अस्तव्यस्त कर देता है कि हम अनेक बीमारियों की चपेट में आने लगते हैं. हमने पहले के कुछ संवाद में इस बात का जिक्र किया है, कैसे तनाव हमारी आंतों तक पहुंच रहा है. पिछले दो महीने से कम समय में मेरे दो सुपरिचित परिवार के अलग-अलग उम्र के परिजनों की मेडिकल रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है. इसमें हमारे पास उपलब्ध सभी तरह की जांच पड़ताल के बाद जब मूल बीमारी का नाम सामने आया तो सभी के लिए नया अनुभव था. यह बीमारी थी- तनाव.

इसमें एक गृहिणी हैं. जो भविष्य की चिंता, परिवार की आर्थिक स्थिति के तनाव को नहीं संभाल पाने के कारण गंभीर रूप से बीमार रहीं. दूसरी एक मां हैं, जो लंबे समय से अकेलापन महसूस कर रही थीं, उनकी सभी तरह की जांच होने के बाद डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंचे कि वह शारीरिक रूप से एकदम ठीक हैं लेकिन तनाव से उनकी पूरी पाचन प्रक्रिया और आंतें प्रभावित हो रही हैं.

हमारे मित्र डॉ. राजीव सोलंकी बताते हैं कि मस्तिष्क और आंतें निरंतर संवाद में रहते हैं. यह संबंध हमारी पाचन प्रक्रिया और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का ध्यान रखता है. इसलिए जैसे ही तनाव बढ़ना शुरू करता है, हमारी पाचन प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ने लगता है. डॉक्टर सोलंकी ने एक बार मेरे मित्र को लंबे समय तक एसिडिटी की शिकायत के बाद केवल इतना कहा कि चिंता करना छोड़ दीजिए. आप विश्वास कर सकते हैं कि लगभग एक महीने के संवाद के बाद उन्होंने जब अपनी चिंता से मुक्ति पा ली तो उसके बाद एसिडिटी से लेकर पाचन संबंधी उनकी सभी समस्याएं सहज दूर हो गईं.अपने मन से दूरी के कारण ही हम अनावश्यक चिंता से घिरने लगते हैं. संवाद की कमी, मन को बहुत से डर की ओर धकेल ती है. संवाद जितना परिवार, दोस्तों से जरूरी है, उतना ही स्वयं से भी. खुद को सही समय पर मन को समझाना, पोषण देना जीवन के सबसे जरूरी काम में शामिल कीजिए. इससे स्वयं को बहुत से संकटों से आसानी से बचाया जा सकता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18 एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: February 13, 2020, 1:24 PM IST
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