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#जीवनसंवाद: रिश्‍ते और प्रेम के पुल!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 21, 2020, 12:46 PM IST
#जीवनसंवाद: रिश्‍ते और प्रेम के पुल!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जीवन की यात्रा में उनका साथ सबसे मजबूती से पकड़िए, जिनके सहारे आपने संघर्ष के जंगल पार किए. ऐसे लोगों का साथ, अपनों के स्‍नेह, अनुराग के बिना अकेलेपन से लड़ना संभव नहीं.

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  • Last Updated: January 21, 2020, 12:46 PM IST
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दूसरों से हमारे रिश्ते कैसे हैं, यह उनसे अधिक स्वयं हम पर निर्भर करता है. किसी का स्वभाव बहुत अधिक मिलनसार हो सकता है, तो कोई एकदम अंतर्मुखी. लेकिन अंतर्मुखी होने का अर्थ यह नहीं हुआ कि उसके प्रेम में कोई कमी है. ठीक इसी तरह मिलनसार व्यक्ति संबंधों को बहुत दूर तक न ले जा सके यह भी संभव है! रिश्तों में स्नेह का निवेश सबसे जरूरी है. पहले यह कहने और लिखने की जरूरत ही नहीं थी, लेकिन पिछले एक दशक में हम आर्थिक निवेश के चक्कर में इतने अधिक उलझ गए हैं कि रिश्तो में निवेश कहीं पीछे छूट गया. हमने प्रेम के पुल बनाने बंद कर दिए. अब केवल सीढ़ियां बनाते हैं. ऊपर पहुंचते ही उनको गिरा देते हैं. भूल रहे हैं, उतरना भी है.

नौकरी लगते ही. कुछ हासिल करते ही सबसे पहले उनसे दूरी बनती जाती है, जिनकी छांव अभी तक सारी धूप से बचाने का काम करती थी. सोमवार के अंक में हमने भारतीय क्रिकेट टीम के गेंदबाज प्रवीण कुमार के जीवन में तनाव और डिप्रेशन के कारण उनके आत्‍महत्‍या के बहुत नजदीक पहुंच जाने की बात कही थी.

(डिप्रेशन, आत्महत्या और प्रवीण कुमार!)

प्रवीण के जीवन में सबसे बड़ा दुख यही है कि वह अकेले पड़ गए हैं. उनको अपना आलीशान घर खाली-खाली लगता है. क्‍योंकि वह अपने ही शहर में परिवार से दूर रहते हैं. अपने संयुक्‍त परिवार, दोस्‍तों से दूर रहते हैं. कितनी अजीब बात है, जब तक हम संघर्ष कर रहे होते हैं, सबके साथ होते हैं. सुख-दुख का सामना मिलकर करते हैं. लेकिन जैसे ही कामयाबी की रोशनी जिंदगी पर पड़ती है, जिंदगी अक्‍सर खुद को संभाल नहीं पाती. प्रवीण कुमार, विनोद कांबली अपने को न संभाल पाने की कहानी सिखाने वाले लोग हैं. सचिन तेंदुलकर एक सामान्‍य परिवार से आते हैं, लेकिन कभी उनके आसपास संबंधों का रूखापन नजर नहीं आता. जब कभी वह मुश्किल में दिखे, हमेशा ऐसा महूसस हुआ कि स्‍नेह की चादर उनको हर दर्द से संभाल रही है.

मुश्किल, दुविधा, दुख, तनाव, अनबन हर रिश्‍ते में होते हैं. हर किसी की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं. हम मुश्किल समय में खुद को किस तरह संभालें, यही तो जीवन की कला है. यहीं आकर सारी शिक्षा, कायदे और स्‍नेह का मूल्यांकन होता है.


एक दिन मेरे एक सहकर्मी ने कहा. हमारे साथ काम करने वाले अनेक युवा साथियों के पास नई-नई गाड़ियां कहां से आती हैं, जबकि उनका वेतन कम है! आखिर वह नौकरी लगते ही कार-मकान कैसे बदलने लगते हैं!

मैंने कहा, 'आपको इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप किस गाड़ी से ऑफिस आते हैं. कैसे, कितने बड़े घर में रहते हैं. लेकिन हमारे युवा साथियों जिनको इन दिनों मिलेनियल्स/जनरेशन जेड 

(अमेरिका के सेंसस ब्यूरो यानी जनगणना के आंकड़ों की मानें तो इस वक्त दुनिया की एक चौथाई आबादी मिलेनियल्स की है. आसान भाषा में हम इसे युवा आबादी कह सकते हैं. 1980 से साल 2000 के बीच जो लोग पैदा हुए यानी जो 21वीं सदी की शुरुआत में वयस्क हुए हैं, उन्हें मिलेनियल्स कहा जाता है. इस शब्द को हम युवा आबादी या उभरते हुए युवाओं के तौर पर भी समझ सकते हैं.) ऐसा देखा/ कहा जा रहा है कि यह उस तरह से नहीं सोचते जैसा भारत में सोच विचार, जीवनशैली का पारंपरिक तरीका रहा है. अच्‍छी बात है.

बदलाव, परिवर्तन समाज की सहज प्रकिया है. इससे असहमति कैसी. लेकिन केवल एक बाधा है. हम भूल रहे हैं कि साथ रहना मनुष्‍य का स्‍वाभाविक, पुरातन गुण है. इससे उसे ऐसी मुश्किलों का सामना करने की शक्ति मिली, जिनको अकेले सहने से उसके जीवन पर नकारात्‍मक असर पड़ता. इस समय सबसे बड़ी चुनौती अपने को उस दौड़ से बाहर रखना है जिसका आंतरिक सुख और अपने होने से कोई संबंध नहीं है.


थोड़ा अतीत की ओर चलते हैं. अपने माता-पिता /दादा-दादी /नाना-नानी की ओर देखिए. वह रिश्‍तों को कैसे निभाते थे. वह संपन्‍नता, सुख और वैभव को कैसे सहन करते थे. यहां जानबूझकर सुख और सफलता के लिए सहना शब्‍द उपयोग किया गया.

सुख सहना सबको नहीं आता. फूल जानते हैं, कैसे खामोशी, आनंद से खिलना है. नदी समझती है, कैसे भरी बरसात को सहेजना है. दुख उन्‍हें घेरता है, जो सुख को सलीके से नहीं सहते.

इसलिए जीवन की यात्रा में उनका साथ सबसे मजबूती से पकड़िए जिनके सहारे आपने संघर्ष के जंगल पार किए. ऐसे लोगों का साथ, अपनों के स्‍नेह, अनुराग के बिना अकेलेपन से लड़ना संभव नहीं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: January 21, 2020, 12:44 PM IST
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