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#जीवनसंवाद: बेचैनी के बादल!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 16, 2020, 10:27 AM IST
#जीवनसंवाद: बेचैनी के बादल!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: आखिर हमारा मन ऐसा क्यों है. वह क्यों भावना के आवेग को नहीं सह पाता. जबकि वह हिमालय की सर्द हवाएं सह लेता है.

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  • Last Updated: January 16, 2020, 10:27 AM IST
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दिन ढलता है. सुबह से शाम होती है. मौसम बदलते रहते हैं. तपता सूरज जाता है, शीतल चंद्रमा आता है. वैसे ही हमारा मन भी है. उसे भी तरह-तरह के मौसम प्रभावित करते हैं. हम सबसे अधिक किन चीजों से हारते हैं. इसकी एक सामान्य सूची बनाकर थोड़ा ध्यान से इस पर सोचा जाए तो हम बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि हमें तोड़ने के लिए किसी डायनामाइट की जरूरत नहीं है. मजबूत से मजबूत व्यक्ति भी मामूली चीजों से टूट जाते हैं. ‌चूर-चूर हो जाते हैं. रुई की तरह हल्की, गुलाब की पंखुड़ियों की तरह कोमल चीजों से हमारा मन ऐसे टूट जाता है कि उसे लाख कठोर चीजों की निगरानी में रख दिया जाए फिर भी नहीं जुड़ता.

नाराजगी, गुस्से, प्यार में कही गई मामूली सी बात भी कई बार मन पर इतना गहरा असर डाल देती है कि मन भीतर तक टूट जाता है. जिन चीजों से शरीर को खरोंच भी नहीं आती, उनकी चोट से मन जिंदगी भर तड़पता रहता है. आखिर हमारा मन ऐसा क्यों है. वह क्यों भावना के आवेग को नहीं सह पाता. जबकि वह हिमालय की सर्द हवाएं सह लेता है. प्रशांत महासागर की काली रात में टूटी नौका पर सवार उसका मन नहीं घबराता लेकिन यही मन किसी अपने के जाने के बाद टूटकर बिखर जाता है. जैसे कांच का कोई गिलास. कोई बर्तन फूल का.

किसी जमाने में फूल के बर्तन भी होते थे. फूल भी एक धातु है. उसे फूल इसीलिए कहते थे क्योंकि वह गिरते ही टूट जाता था. हमारी दादी बहुत संभाल कर इन बर्तनों का उपयोग करती थीं. बड़ी मिन्नतों के बाद इनमें कुछ खाने को देती थीं. फूल के बर्तन तो अब चलन से बाहर हो गए. लेकिन हमारा मन हर दिन फूल से भी कोमल होता जा रहा है. कोमल मन को इच्छाशक्ति का जिरह-बख्तर (कवच) चाहिए, जिससे इसे बात- बात में टूटने से बचाया जा सके.


एक मित्र हैं. बाहर से उनका शरीर एकदम बॉडी बिल्डर सरीखा है. भीतर से एकदम फूल के बर्तन माफिक. समझाना बहुत मुश्किल हो जाता है. उनकी चाहत बहुत सामान्य है. वह जो चाहते हैं. उनकी चाहत होती है कि सब उस पर आसानी से राजी हो जाएं. कितनी मासूम सी उनकी चाहत है. सारी दुनिया केवल यही तो चाहती है कि उसकी चाहत पर सब राजी हो जाएं.



जैसे ही इन चाहतों में टकराव होता है, मन निराशा के भंवर में डूबने लगता है. मजबूत से मजबूत इरादे वाले मन भी वहां टूट जाते हैं, जहां अपनों के ही प्रश्न घेरने लगते हैं. हम अपनों की असहमति और प्रेम में अंतर नहीं कर पाते. आप से प्रेम करने का मतलब यह नहीं है कि मैं आपकी सभी बातों से सहमत हो जाऊं. असहमत होते हुए भी आसानी से प्रेम किया जाता है. एक-दूसरे का सम्मान किया जा सकता है. साथ रहा जा सकता है. साथ निभाया जा सकता है. साथ दिया जा सकता है.
‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌मैंने बहुत लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियों का सामना किया है जिसमें प्रेम था लेकिन निर्णय में असहमति थी. अपने फैसले स्वयं लेना, दूसरों के साथ प्रेम करते हुए भी. यह जीवन जीने की सच्चे अर्थ में वैज्ञानिक कला है. इसमें विज्ञान भी है, कला भी. अपने मन को इतना परिपक्व बनाना जरूरी है, जहां जाकर वह अपनोंं का ही विरोध सहना सीख सके. विरोध सहना एक अच्छी आदत है. धीरे-धीरे आती है. लेकिन जिस दिन हो जाती है उस दिन आप का मन दुनिया के किसी भी विरोध का सामना कर सकता है. बेचैनी के बादल उसे डरा नहीं सकते. बादल स्थाई नहीं होते. मन की बेचैनी, दुविधा और डर भी बादल जैसे ही होते हैं. मन में धैर्य और विश्वास की धूप रहे तो वहां बेचैनी केे बादल नहीं टिकते.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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First published: January 14, 2020, 10:07 AM IST
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