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#जीवनसंवाद: जिंदगी बहुत सरल है लेकिन...

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 14, 2019, 12:46 PM IST
#जीवनसंवाद: जिंदगी बहुत सरल है लेकिन...
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हम अपने परिवेश, पारिवारिक पृष्ठभूमि और परंपरागत विचारों से बहुत अधिक बंधे रहते हैं. बदलते समय के हिसाब से हम स्वयं को बदलने का नारा तो गढ़ते रहते हैं, लेकिन बदलते नहीं.

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  • Last Updated: October 14, 2019, 12:46 PM IST
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जिंदगी मुश्किल नहीं है. लेकिन यह ऊंची-नीची रेखाओं पर चलकर ही संवरती है. सबसे अच्छा खिलाड़ी वह नहीं माना जाता जो सामान्य परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन करता है. सर्वोत्तम वही है, जो मुश्किल वक्त में भीतर की सारी शक्ति झोंक देता है. यह शक्ति कहां से आती है? हम में से कुछ लोग इस शक्ति का उपयोग रचनात्मक जीवन के लिए कर लेते हैं, लेकिन अधिकांश अपनी क्षमता से कोसों दूर रहते हैं.

हम अपने परिवेश, पारिवारिक पृष्ठभूमि और परंपरागत विचारों से बहुत अधिक बंधे रहते हैं. जीवन को देखने और समझने का दृष्टिकोण इसके अनुरूप ही संचालित करते रहते हैं. बदलते समय के हिसाब से हम स्वयं को बदलने का नारा तो गढ़ते रहते हैं, लेकिन बदलते नहीं.

आज एक ही परिवार से दो कहानियां सुनते हैं. राजस्थान के उदयपुर से सुबोध गुप्ता की दो बेटियां हैं. दोनों एक जैसे वातावरण में पली-बढ़ीं. एक जैसी क्षमता से शिक्षित किया गया. संयोग से दोनों को शिक्षक की नौकरी मिली. उदयपुर में ही. बड़ी बेटी के पास इंजीनियर, शिक्षक में से किसी एक को जीवनसाथी चुनने का विकल्प था, उन्होंने इंजीनियर पति का चुनाव किया. उनकी आर्थिक स्थिति समय के साथ बेहतर होती गई. बचपन में बहुत सारी परेशानियों का सामना करने के कारण उनके भीतर एक किस्म का गुस्सा था. हीनता का बोध भी. अपने परिवार के साथ एक दूरी बना ली. अपनी दुनिया में व्यस्त होने में उन्हें अधिक समय नहीं लगा. दूसरी ओर छोटी बेटी ने नौकरी के बाद परिवार से संभालने का फैसला किया. इस बीच शादी के प्रस्ताव आते रहे लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया.

अचानक एक दिन उनके पिता की तबीयत खराब हो गई. जांच पड़ताल के बाद पता चला कि उनकी किडनी में समस्या है. डॉक्टर ने कहा किडनी का इंतजाम करना होगा. छोटी बिटिया ने बड़ी बहन से मदद मांगी. उन्होंने किसी भी तरह की आर्थिक सहायता करने में असमर्थता जाहिर कर दी. संयोग से अस्पताल के डॉक्टर छोटी बहन के मित्र निकले. उन्होंने अपने प्रयास से इस मुश्किल काम को सरलता से कराने में मदद की. किडनी छोटी बेटी ने दी. सबके मना करने के बावजूद. उनके पिता ने बहुत मुश्किल से यह बड़ा निर्णय स्वीकार किया. अब सब ठीक है. जिस मित्र ने अस्पताल में सहायता की, उनके पिता इस बेटी के सेवा भाव से इतने प्रसन्न हुए कि अपने सुपरिचित परिवार से विवाह की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए शादी तय करा दी.



सब कुछ एकदम सिनेमाई अंदाज़ में हो गया. बड़ी बेटी और मदद से दूर रहे रिश्तेदार हैरान परेशान रहे. निश्चित समय बाद विवाह संपन्न हो गया. छोटी बेटी को नगर के बहुत सामाजिक, प्रतिष्ठित परिवार का साथ मिला. उनके जीवन की दशा-दिशा दोनों बदल गई. उनके माता-पिता का जहां पर घर था वहां भारत सरकार की किसी प्रस्तावित योजना के होने के कारण उनका घर अधिग्रहण क्षेत्र में आ गया. समय पर उसका उचित मुआवजा मिलने से उनके आर्थिक संकट बहुत हद तक दूर हो गए. वक्त ने करवट बदली और बड़ी बहन के ऊपर कुछ आर्थिक संकट आया. अपने माता-पिता की ओर जाते हुए उन्हें संकोच हुआ. मदद मांगी, लेकिन मां को मदद से इनकार करते हुए देर नहीं लगी. मजबूरी में उनको छोटी बहन की ओर जाना पड़ा. छोटी बहन ने आगे बढ़कर उनकी मदद की. जिससे उनका संकट दूर हुआ.

पहली नज़र में कहानी में कुछ भी खास नहीं है. ऐसे किस्से तो समाज, परिवार में सुनने को मिलते ही रहते हैं. लेकिन इसमें खास यह है कि एक ने स्नेह, प्रेम और आत्मीयता का साथ किसी परिस्थिति में नहीं छोड़ा, तो दूसरे ने समय के अनुसार अपना व्यवहार बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह प्रेरक कहानी हमसे उदयपुर के सुधि पाठक दिनेश चतुर्वेदी ने साझा की है. ‌‌‌‌‌‌

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जिंदगी बहुत मुश्किल नहीं है, अगर एक-दूसरे के दुख को साझा करने का हुनर सीखे लें. हमारा संकट शुरू ही तब होता है, जब संवेदना, आत्मीयता की कमी भीतर बढ़ने लगती है!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 14, 2019, 8:14 AM IST
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