लाइव टीवी

#जीवनसंवाद: आंसू पर पहरेदारी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 9:53 AM IST
#जीवनसंवाद: आंसू पर पहरेदारी!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जब भी ऐसा कष्‍ट हो, जिससे मन दुखी हो गया हो. भीतर घुटन बढ़ गई हो तो रोने से परहेज नहीं करना चाहिए. किसी ऐसे सखा/सखी का चुनाव कीजिए, जिसके सामने मन के बंधन खोलने में शर्मिंदगी न हो.फिर भी न मिले तो मनोचिकित्‍सक के पास जाइए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 3, 2019, 9:53 AM IST
  • Share this:
सचिन तेंदुलकर ने जब से आंसू को नहीं छुपाने, खुलकर रोने की बात कही है, समाज में इस पर संवाद हो रहा है. सचिन ने आंसुओं को कमजोरी नहीं समझने की सलाह ही है. यह लिखते हुए प्रसन्‍नता हो रही है कि आपके प्रिय कॉलम ‘डियर जिंदगी: जीवन संवाद’ में हम यह बात लगभग तीन साल से करने हुए इस पर ध्‍यान देने की बात कर रहे हैं. असल में हमने अपने मन को सरल, सरस, तनाव से दूर रखने की जगह उस पर पहरे लगा दिए. आंसू को अपने भीतर रोके रखना, भीतर घुटते रहना मन पर पहरेदार बैठाने जैसा ही है.

अगर हम आंसुओं का रासायनिक विश्‍लेषण करें तो पाते हैं कि इनमें अनेक स्‍ट्रेस हार्मोन भी पाए जाते हैं. इसलिए, रोने से मन हल्‍का होता है. बारिश के बाद जिस तरह हवा साफ, मीठी, धुल जाती है, वैसे ही आंसू बहने के बाद हमारा मन हो जाता है. इसका स्‍त्री-पुरुष से कोई संबंध नहीं. यह भेद समाज से आया है. इसकी शरीर, मन से रिश्‍तेदारी नहीं है. इसलिए, आंसू थामने का कोई अर्थ नहीं. यह अपने को सजा देने का काम है.

आंसुओं को हमने सहजता से स्‍वीकार करने की जगह संकीर्णता से लिया. इसलिए, इसे केवल स्त्रियों से जोड़ दिया. आए दिन हम सुनते रहते हैं, ‘क्‍या लड़कियों की तरह रोते रहते हो. मर्द रोते हुए अच्‍छे नहीं लगते. लड़कों को लड़कियों की तरह नहीं रोना चाहिए.’ऐसी बातें असल में यह बताने के लिए पर्याप्‍त हैं कि हम अपने मन, चेतना के प्रति वैज्ञानिक सोच से बहुत दूर हैं.


एक छोटा सा प्रयोग कीजिए. ऐसे लोगों की सूची बनाइए जो थोड़े भावुक हैं. संवेदनशीलता से बात करते हैं. मुश्‍किल वक्‍त, भावनाएं आहत होने पर गुस्‍सा हो जाते हैं. आसानी से रो देते हैं. अब इसे ऐसे लोगों से मिलाइए जो ऐसा नहीं करते. आप पाएंगे कि रोने वाले लोग अधिक स्‍वस्‍थ, मजेदार और बेहतर मनुष्‍य होते हैं.

जब भी ऐसा कष्‍ट हो, जिससे मन दुखी हो गया हो. भीतर घुटन बढ़ गई हो तो रोने से परहेज नहीं करना चाहिए. किसी ऐसे सखा/सखी का चुनाव कीजिए, जिसके सामने मन के बंधन खोलने में शर्मिंदगी न हो. अगर आपके समीप कोई ऐसा नहीं है तो उसे तलाशिए. फिर भी न मिले तो मनोचिकित्‍सक के पास जाइए. वह आपको अपनी भावना व्‍यक्त करना सिखाएंगे. यह हमारे मनुष्‍य बने रहने की दिशा में सबसे जरूरी काम है.

हमारी एक मित्र हैं. जिनके ठहाके घर के बाहर तक सुनाई देते हैं. सहज संवाद में भी उनकी हंसी की गूंज दूर तक रस घोलती है. अपनी हंसी के लिए वह खासी लोकप्रिय हैं. वह जितनी खुशमिजाज हैं , उतनी ही भावुक भी. अगर ऐसा कुछ भी हो जो उनके मन को चुभा हो तो वह आंसू नहीं रोक पातीं.उनके पति इससे चिंतित रहते थे. एक बार उन्होंने यह बात मुझसे भी कही. मैंने उनसे इतना अनुरोध किया कि वह परेशान न हों, जितना जल्‍दी वह भी ऐसा करने लगेंगे, वह भी उनकी तरह प्रसन्‍नचित्‍त हो जाएंगे. जीवन में सुख और सुख में एक जैसा रहने का एक अभ्‍यास यह भी है कि सुख में सुखी हो जाइए, दुख में दुखी. लेकिन अगले ही पल इससे मुक्‍त हो जाइए.

यह सरल नहीं है. धीरे-धीरे जीवन में आएगा. जीवनशैली बनने में समय लगेगा. लेकिन इतना तय मानिए कि एक बार अगर हमारे पुरुष- स्त्रियों की तरह रोने लगेंगे, तो हमारा समाज कहीं अधिक प्रसन्‍नचित्‍त, आनंदपूर्ण हो जाएगा. मन पर पहरे मत बैठाइए. उसकी भावनाओं पर अंकुश मत चलाइए. उसे बंधनमुक्‍त करिए. बदले में वह आपको सेहतमंद, सुखी और आनंद‍ित करेगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18 एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें: #जीवनसंवाद: अपमान सहने की क्षमता!

#जीवनसंवाद: मन किसके बस में है...

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: December 3, 2019, 8:52 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर