लाइव टीवी

#जीवन संवाद: बच्‍चे के मन का खयाल!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 20, 2019, 2:51 PM IST
#जीवन संवाद: बच्‍चे के मन का खयाल!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: बच्‍चा क्‍या सोच रहा है. कैसे सोच रहा है. उसके सोचने के तरीके का ध्‍यान रखना है. वह हमारी बात को कैसे ग्रहण करता है. उस पर अपनी प्रतिक्रया कैसे व्‍यक्‍त करता है. इसे नम्रता से समझना है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 20, 2019, 2:51 PM IST
  • Share this:
जीवन में सबसे जरूरी चीज़ क्‍या है. इसके अनेक उत्‍तर हो सकते हैं. सबके अपने-अपने तर्क सहित. इस चुनाव में मैं केवल इतना जोड़ता हूं कि बचपन से अपने मन को संभालना सबसे मूल्‍यवान काम है. इसका अर्थ यह हुआ कि हमें सबसे अधिक बच्‍चे का खयाल रखने की आदत बनानी चाहिए. हम बच्‍चे का खयाल नहीं रखते! इस बात से आप विचलित हो सकते हैं, लेकिन यह सच है. हममें से बहुत से लोग अपने बच्‍चों का ध्‍यान वैसे नहीं रख पाते. जिस तरह रखना चाहिए.

हम बच्‍चे के परीक्षा में आने वाले नंबर का ध्‍यान रखते हैं. स्‍कूल में वह किन चीज़ों में हमारा नाम रोशन कर रहा है. इस बात का खूब खयाल रखते हैं. बस, हम इस बात का खयाल करना भूल जाते हैं कि हमें बच्‍चे के मन का ध्‍यान रखना है. ठीक वैसे, जिस तरह हम ईएमआई का ध्‍यान रखते हैं. किश्‍त न छूट जाए. क्रेडिट रैंकिंग नीचे न आ जाए. मनपसंद चीज़ को संभालते हैं. उतने ही प्रेम से बच्‍चे के मन का ध्‍यान रखना है.



बच्‍चा क्‍या सोच रहा है. कैसे सोच रहा है. उसके सोचने के तरीके का ध्‍यान रखना है. वह हमारी बात को कैसे ग्रहण करता है. उस पर अपनी प्रतिक्रया कैसे व्‍यक्‍त करता है. इसे नम्रता से समझना है.


पिता बनने के बाद ही हम बचपन को अच्‍छी तरह समझ सकते हैं. हमें जो नहीं भाता था, हम बच्‍चे पर वही तो नहीं थोप रहे. अपने साथ वाली कहानी बच्‍चे के साथ नहीं दुहरानी है. यही बच्‍चे के प्रति सबसे बड़ा स्‍नेह है!

'डियर जिंदगी' जीवन संवाद की सबसे नियमित पाठकों में से एक नोएडा की सुलभा दुबे ने अपना अनुभव हमसे साझा किया है.

वह लिखती हैं, 'मैंने महसूस किया, मेरी बेटी अचानक गुमसुम रहने लगी थी. अच्‍छे स्‍कूल, सोसायटी के बाद भी उसमें खुशी का भाव बहुत कम था. मैं कम नंबर लाने के लिए उसे आए दिन डांटती रहती. मुझे लगता यह ठीक है. क्‍योंकि मेरी मां तो इससे भी कड़ाई से मुझसे पेश आती थीं. लेकिन मैं भूल गई कि मेरी मां के पास मोबाइल नहीं था. जो आज हम दोनों के पास है. दुनिया बहुत बदल चुकी है. बेटी के मन में गहरी निराशा घर करती जा रही थी. मैं जीवन संवाद को लगातार पढ़ रही थी. लेकिन इसे स्‍वीकार करने के प्रति सहज नहीं थी. इसी दौरान बेटी की तबीयत खराब हो गई. तब एक मनोचिकित्‍सक ने वही सब समझाया, जो आप लिख रहे हैं. मैंने अपनी बेटी का ध्‍यान रखना शुरू किया. उसकी कामयाबी का नहीं. कुछ ही दिनों में सब ठीक हो गया. मेरी बेटी कहीं अधिक खुश है. मैं भी.'
Loading...

हमें यह बात सजगता से मन में बांध लेनी है. कामयाब बच्‍चे की चाहत में उससे अनुराग, आत्‍मीयता कम नहीं होनी चाहिए. आपके प्रेम के छौंक की कमी उसे कुंठित, दुखी कर सकती है. दुखी बच्‍चा आगे जाकर केवल दुखी होगा. जबकि प्रेम पाने वाला सुखी बच्‍चा जो चाहे कर सकता है. इसलिए बच्‍चे के मन को टूटने से बचाना है. हर कीमत पर!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें:

#जीवन संवाद: भीतर से ठोस!

#जीवन संवाद : अपने साथ खड़े होना

#जीवनसंवाद : मन सहेजने की फुर्सत!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 20, 2019, 9:58 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...