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#जीवन संवाद: बच्चों का गुस्सा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 4, 2019, 3:12 PM IST
#जीवन संवाद: बच्चों का गुस्सा!
समय के साथ, चचेरे ममेरे भाई-बहनों की लंबी चौड़ी फौज होती थी. इससे संभव है बच्चों के पढ़ने लिखने का कुछ समय कम रहा हो, लेकिन उनके घुलने-मिलने और सीखने के समय में कोई कमी नहीं थी.

Jeevan Samvad: इस समय जो लोग माता-पिता बनने की अवस्था में हैं, उनकी परवरिश आज के बच्चों के मुकाबले बहुत ही अलग तरह से हुई है. यह भी एक कारण है, जिससे वह बच्चों के लिए सामने आ रही नई चुनौतियों को पढ़ने में संभवत: कुछ गड़बड़ी कर रहे हैं.

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  • Last Updated: October 4, 2019, 3:12 PM IST
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इस समय दुनिया की चिंता में हमारे बच्चों का गुस्सैल होते जाना भी है. बच्चों का व्यवहार माता-पिता की चिंता का सबसे बड़ा कारण होना चाहिए. इस समय जो लोग माता-पिता बनने की अवस्था में हैं, उनकी परवरिश आज के बच्चों के मुकाबले बहुत ही अलग तरह से हुई है. यह भी एक कारण है, जिससे वह बच्चों के लिए सामने आ रही नई चुनौतियों को पढ़ने में संभवत: कुछ गड़बड़ी कर रहे हैं. अस्सी, नब्बे के दशक में माता-पिता में से कोई एक ही कामकाजी होता था परिवार के पास बच्चों को देने के लिए बहुत सारा समय था.



समय के साथ, चचेरे ममेरे भाई-बहनों की लंबी चौड़ी फौज होती थी. इससे संभव है बच्चों के पढ़ने लिखने का कुछ समय कम रहा हो, लेकिन उनके घुलने-मिलने और सीखने के समय में कोई कमी नहीं थी. बच्चों के पास कोई अकेलापन नहीं था. उनके मन में क्या चल रहा है इसको समझना कम से कम इतना मुश्किल नहीं था जितना इस समय है.

हमारे यहां आस-पास बच्चे तब भी थे, बच्चे आज भी हैं. बच्चों से कहीं अधिक अगर कहीं कुछ बदला, तो वह है बड़ों का व्यवहार. हमारे सोचने समझने, जीवन को देखने का सलीका. टीवी आने के बाद बच्चे उसे देखने के लिए लगातार जिद करते थे. माता-पिता 'उचित' आदेश के साथ उन्हें इसकी अनुमति देते. बाहर खेलने का समय सबसे अधिक होता था. उसके बाद बचे हुए समय में पढ़ाई और टेलीविजन होते थे.

बच्चे का स्क्रीन टाइम सबसे कम था. उस समय टेलीविजन और शक्कर दोनों ही बहुत थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हमें मिलते थे. धीरे-धीरे दोनों ही बढ़ते गए. बच्चों की आज की स्थिति के लिए यह बहुत बढ़िया पैमाना है. हमारे जीवन में एक ओर चीनी के अत्यधिक उपयोग से 'शुगर' बढ़ा तो दूसरी ओर बच्चों का स्क्रीन टाइम हमारी पहुंच से बाहर होता गया. इन दोनों ने बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला. बच्चे इंटरनेट पर पसरी हिंसा और क्रूरता के बीच बड़े हो रहे हैं. बच्चों की बातें, उनके शब्द चयन और व्यवहार में इंटरनेट की भाषा का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.

बच्चे रोते, जिद करते हैं तो हम उन्हें सरलता से मोबाइल थमा देते हैं. हम उन्हें उनके लिए भी अलग से मोबाइल देने से पीछे नहीं हट रहे. हम चाहने लगे हैं कि बच्चे जो मर्जी चाहे करें, लेकिन बार-बार हमें परेशान न करें. अभिभावक यह भी कहते हैं, 'हमारे पास भी समय की कमी है. ऐसे में बच्चे को मोबाइल देने से वह उसमें व्यस्त हो जाता है और हम आसानी से अपने काम निपटा लेते हैं.' यह कहते हुए हम भूल रहे हैं, मोबाइल खिलौना नहीं है. वह एक प्रतिक्रिया देने वाला, बच्चे से चतुर मशीन है. उनका दिमाग पढ़कर वह उन्हें अपने अनुसार मोड़ने की क्षमता रखता है. वह बच्चे को रूखा, अकेला बना रहा है!

हमें बच्चों को जितना संभव हो समय, अपना साथ, स्नेह और आत्मीयता देने का अभ्यास करना होगा. बच्चा हमारा है, उसेे हमें समय, साथ देना होगा. तकनीक और दूसरों के भरोसे छोड़ने से उसका अकेलापन और गुस्सा कम होने की जगह बढ़ेगा.

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यह अपने लिए बेहतर दुनिया बनाने का जरूरी काम है. इसे भी उतनी ही प्राथमिकता दीजिए, जितनी नौकरी और अपने व्यवसाय को देते हैं. बच्चे के लिए साधन जुटाना अच्छा है. लेकिन उस समय की कीमत पर नहीं जिसके लिए वह तरसता रहे!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 4, 2019, 9:34 AM IST
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