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#जीवनसंवाद: तुम्‍हारा साथ!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 12, 2020, 12:48 PM IST
#जीवनसंवाद: तुम्‍हारा साथ!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हमारे रिश्‍ते मोबाइल और इंटरनेट के कारण गहरे संकट में हैं. हम असली दुनिया, रिश्‍तों के हिस्‍से का समय स्‍मार्टफोन के लिए कुर्बान किए जा रहे हैं.

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  • Last Updated: February 12, 2020, 12:48 PM IST
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पहले तुम्‍हारा साथ गहरा होता था. एकदम सधा हुआ. पहले तुम्‍हारे साथ का स्‍पर्श मन तक आसानी से पहुंच जाता था. अब ऐसा क्‍यों नहीं है. अब तुम्‍हारा साथ कहीं खोया रहता है. रिश्‍तों में संवाद कम होता जा रहा है. बात करने के लिए कुछ नहीं. सब स्‍मार्टफोन ने सोख लिया. भीतर का खालीपन मन की सतह पर आ गया है. यहां तुम्‍हारे साथ की शिकायत करने वाले रिश्‍तों में बहुत विविधता है.

कहीं मां बेटे से यही बात कह रही है. कहीं पति/पत्‍नी/ प्रेमी/प्रेमिका एक सरीखी शिकायत कर रहे हैं. हमारे रिश्‍ते मोबाइल और इंटरनेट के कारण गहरे संकट में हैं. हम असली दुनिया, रिश्‍तों के हिस्‍से का समय स्‍मार्टफोन के लिए कुर्बान किए जा रहे हैं. हम साथ होकर भी एक-दूसरे के मन से दूर होते जा रहे हैं. साथ कहीं खो गया है. अकेलापन गहरा हो रहा है. हम जिनके साथ रहते हैं, उनके साथ न होकर, उनके लिए तरस रहे हैं, जो हमारे नहीं हैं.

कितनी दिलचस्‍प बात है कि जिसे देखि‍ए, वही अपने मोबाइल में गुम-सा दिखता है. हर व्‍यक्ति कहां व्‍यस्‍त है, इसकी कोई ठोस वजह नहीं. उससे पूछिए तो यही कहेगा, समय कहां मिलता है. लेकिन ध्‍यान से देखने पर पता चलता है कि उसके पास समय की कोई कमी नहीं. समय ही समय है. समय अगर कहीं नहीं है तो वह है, उसके भीतर समय के बोध का गायब हो जाना.




हम एक सरल उदाहरण से समझते हैं. एक परिवार खाने की मेज़ पर है. परिवार में पति, पत्‍नी और दो बच्‍चे हैं. बच्‍चों के चाचा हैं. दादा, दादी हैं. खाने के दौरान और खाने से पहले हर दो मिनट में हर कोई अपना मोबाइल ऐसे देखता है, मानिए अगर एक मिनट की चूक हो गई तो न जाने क्‍या छूट जाएगा. जब पूरा परि‍वार एक जगह है. सब साथ में हैं तो किससे इतनी जरूरी बात करनी है, जो तुरंत ही होनी है. यह एक किस्‍म का मानसिक विकार है. एक ऐसी आदत जो बाहर से एकदम सामान्‍य दिखती है, लेकिन इसके कारण बच्‍चे मोबाइल के बिना दो मिनट आपको चैन से रहने नहीं देते.



कुछ दिन पहले मैं अपने एक मित्र के यहां भोजन पर आमंत्रित था. सभी भोजन कर रहे थे, इस दौरान टीवी पर भारतीय क्रिकेट टीम का मैच चल रहा था. मेजबान का खेल प्रेमी बच्‍चा भी मैच देख रहा था. वह सबको मैच के रोमांचक पलों के बारे में बता रहा था. हमने सोचा वह टीवी पर मैच देख रहा होगा. थोड़ी देर बात कुछ लोगों की राय पर टीवी बंद कर दिया गया. जिससे संवाद पर ध्‍यान केंद्रित रहे.

तभी किसी ने बच्‍चे से मोबाइल ले लिया तो वह बहुत नाराज़ हो गया. उसे संभालना मुश्किल हो गया. अंतत: उसके पिता ने उसे किसी तरह समझाया. कहा कि उसे मोबाइल दे दिया जाए.

यहां थोड़ा ठहरकर ध्‍यान देने की जरूरत है. बच्‍चे की आदत को समझने की जरूरत है. आदत में अब मोबाइल इस तरह आ गया है कि उसे बड़ी और सुविधाजनक स्‍क्रीन पसंद नहीं. उसने अपने मोबाइल को अपनी ‘निजता’ से जोड़ लिया है.


हम उसके साथ कहीं गहराई से जुड़ गए हैं, जो ऑनलाइन है. जो सामने नहीं है. जो हमारी आलोचना नहीं करता. केवल हमारे दिल को बहलाने का काम करता है. केवल हां में हां मिलाने का काम करता है. ऐसे ही अनजान, नए और अपरिचित की चिंता और उसे तुरंत जवाब देने के लिए हम चौबीस घंटे बेकरार रहते हैं.

यह एक खतरनाक आदत है. मनोविकार है. यह तकनीक का उपयोग नहीं है. यह ‘साइंस, टेक्‍नॉलाजी’ के साथ होना नहीं है. यह विज्ञान को अपना उपयोग करने देने जैसा है. यह उन कंपनियों के जाल में फंसने जैसा है तो रात-दिन आपको अपने जीवन से दूर नकली दुनिया में उलझाए रखना चाहती हैं.

इसलिए, थोड़ा समय उनको दीजिए, जिनसे आप हैं. सारा समय उनको नहीं, जो आपको केवल आभासी (वर्चुअल) दुनिया में उलझाए रखना चाहते हैं. हम जिनसे हैं, उनके साथ जब तब आत्‍मीय समय नहीं बिताएंगे, जीवन के तार हमारे अपनों के साथ गहराई से नहीं जुड़ेंगे.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: February 12, 2020, 12:48 PM IST
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