#जीवन संवाद : संकट में साथ!

#जीवन संवाद : संकट में साथ!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: इस वक्त बहुत जरूरी है परिवार के सभी सदस्य अपने आप को एक-दूसरे के साथ गहराई से जोड़कर रखें. एक-दूसरे का साथ दें. इस समय न केवल शरीर का ख्याल रखा जाए बल्कि घर परिवार की अर्थव्यवस्था के बारे में भी जागरूक होकर फैसले लिए जाएं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 18, 2020, 10:45 PM IST
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कोरोनावायरस ने हमारे सामने जीवन के साथ जीवनयापन का भी संकट खड़ा कर दिया है. घर-घर में आर्थिक समस्या धीरे-धीरे बढ़ने की ओर है. संकट सुलझने में कुछ वक्त लग सकता है. इस वक्त बहुत जरूरी है परिवार के सभी सदस्य अपने आप को एक-दूसरे के साथ गहराई से जोड़कर रखें. एक-दूसरे का साथ दें. अलग-अलग रहने का अर्थ परिवार के अलग-अलग होने से नहीं है. इस बात को अक्सर परिवार के नए सदस्य नहीं समझते/ कुछ देर से समझते हैं. तब तक संकट गहरा जाता है.

इसलिए बहुत जरूरी है इस समय न केवल शरीर का ख्याल रखा जाए बल्कि घर परिवार की अर्थव्यवस्था के बारे में भी जागरूक होकर फैसले लिए जाएं. होश में फैसले लिए जाएं. बेहोशी में नहीं. इसे एक छोटे से उदाहरण से कहता हूं.

हमारे एक मित्र का वेतन बीस से तीस फ़ीसदी कट गया. उन पर कई क़िस्तों का दबाव है. उन्होंने कहा क्या किया जाए. मैंने बस इतना निवेदन किया कि सरकार की मोरेटोरियम (बैंक की किस्त चुकाने में छूट का प्रावधान) का उपयोग कीजिए.



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वह कैलकुलेटर लेकर बैठ गए. मैंने फिर निवेदन किया, गणना उसको अच्छी लगती है जिसके पास उसके लिए पर्याप्त धन है. इस तरह की योजना उनके लिए उपयुक्त नहीं है, जिनके पास सीमित धन है. संकट आज का है, उससे निपटने के बारे में अभी सोचा जाना चाहिए. बाद में नहीं. मान लीजिए किस्तों पर ब्याज देना ही पड़ा, तो दस साल बाद देना होगा. जैसा आज माहौल है वैसा तो हमेशा नहीं रहेगा. यह संकट अधिकतम डेढ़ से दो वर्ष का दिख रहा है. उसके बाद फिर से चीज़ें पटरी पर आनी शुरू हो जाएंगी. जब पैसा होगा तो लोन का प्रीपेमेंट कर दीजिएगा. लेकिन आज तो पेमेंट रोकना होगा. मैं उनको ब्याज और भविष्य का नफा नुकसान नहीं समझा सकता. इसलिए नहीं क्योंकि मैं गणित में कमजोर हूं, बल्कि इसलिए क्योंकि इस वक्त इसकी जरूरत नहीं.


मैं 'जीवन संवाद' के हर पाठक को अपने जीवन का हिस्सा मानता हूं. उन सभी से सहज अनुरोध करना चाहता हूं कि अगर आर्थिक रूप से आपके पास अगले छह महीने से साल भर तक का इंतजाम नहीं है तो बिना संकोच मोरेटोरियम का उपयोग कीजिए. यह सुविधा सरकार ने दी है. इसका पूरा उपयोग कीजिए. ऐसी सुविधा का जितना अधिक उपयोग कर सकते हैं कीजिए. क्योंकि इससे आज की किसी भी संकट से आपको संभलने में आसानी होगी.


जब बाढ़ का पानी गांव- शहर में घुसता है तो समझदार लोग भविष्य की ओर नहीं देखते. उससे अपना जीवन बचाने के बारे में प्रयास करते हैं. कोरोना हमारे सामने भी ऐसा ही संकट लेकर आया है. स्वयं को किसी भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक संकट से अगले एक साल तक बचाए रखने के लिए जो कुछ किया जा सकता है, उसे निस्संकोच कीजिए. परिवार, मित्रों का हाथ थामिए. भविष्य की योजना टालिए, आज को देखिए!

एक छोटी सी कहानी आप से कहता हूं. संभव है आपको मेरी बात और अधिक स्पष्ट हो जाए. एक बड़ा संयुक्त परिवार था. सुनार का. पांच भाई थे. पांचों की दुकान अलग-अलग थी लेकिन उनमें एकता बहुत थी. रहते सब आस-पास ही थे. अचानक उनमें से बड़े भाई की तबीयत खराब हुई. उसके बेटे और पत्नी ने सारी संपत्ति को दांव पर लगाकर उसका इलाज़ कराया लेकिन फिर भी कोई लाभ न हुआ. अंततः उसे नहीं बचाया जा सका. बाजार और भाइयों सब से कर्ज लिया गया था. भाइयों ने तो जो दिया था उसे लेने से इनकार कर दिया लेकिन बाज़ार को तो लौटना था. भाइयों ने कहा इसमें वह मदद नहीं कर पाएंगे.

दिवंगत सुनार की पत्नी ने किसी तरह सारा कर्ज उतार दिया. लेकिन अब उसके पास अपने बेटे की परवरिश के लिए कुछ भी न बचा. बहुत खोजबीन के बाद उसे याद आया कि उसके पति ने एक हार किसी दूसरे प्रदेश से लाकर दिया था. यह कहते हुए कि बड़ा मूल्यवान है. उसने वह हार अपने बेटे के हाथ अपने देवर के पास भिजवाया यह कहते हुए कि जो भी इसका मूल्य हो इसे बेचकर उसे दे दिया जाए. बच्चा जब हार लेकर चाचा के पास पहुंचा, चाचा ने उसे अच्छी तरह जांचा परखा. उसके बाद उन्होंने कहा, इसे बेचने की अभी जरूरत नहीं क्योंकि यह हार बेशकीमती है. अभी बाज़ार बहुत मंदा है. तुम ऐसा करो इसे अभी घर पर ही रखो. मेरी दुकान पर काम सीखना शुरू कर दो इससे तुम्हें कुछ पैसे मिलने लगेंगे और घर को चलाने में परेशानी ना होगी. घर के लिए जरूरत पड़े तो मुझसे कुछ उधार ले लो.

उसने मां को लौट कर यह बात बताई. मां और बेटे दोनों का इससे हौसला बढ़ा. बेटा बड़ी मेहनत के साथ दुकान पर काम करने लगा. समय बीता. बीस बरस बाद जब वह बच्चा बीस बरस का हो गया, चाचा ने कहा अब तुमने सारा काम सीख लिया अब तुम धीरे-धीरे अपने स्वतंत्र व्यापार की ओर बढ़ो. मैं तुम्हारी इसमें भी मदद करूंगा. उसने मां को यह बात बताई. मां ने कहा ठीक ही है. अब बाजार मूल्य बढ़ गया है तुम चाचा को ले जाकर यह हार बेच दो. बेटा हार लेकर दुकान पहुंचा. चाचा ने कहा तुम खुद ही इसकी जांच परख कर के इसका मूल्य बताओ.

थोड़ी ही देर बाद वह हार लेकर आया और उसने कहा चाचा यह तो नकली है. एकदम बेकार है. कौड़ियों के मोल है. इसे कौन खरीदेगा.

चाचा ने कहा, एकदम सही. अब तुम पारखी हो गए हो. भतीजे ने कहा लेकिन अगर आप जानते थे कि हार नकली है तो पहले क्यों नहीं बताया था. उस अनुभवी और सहृदय सुनार ने उसे अपने पास बुलाया और स्नेह से कहा- बेटा अगर उस समय तुमसे कहता तो तुम्हें और तुम्हारी मां को यकीन ही ना होता. तुम्हें लगता मुश्किल समय है इसलिए चाचा बेशकीमती हार को मुफ्त में हड़प लेना चाहते हैं. इसलिए मुझे लगा जब तुम बड़े हो जाओगे तो स्वयं इसकी पहचान कर सकोगे! ‌‌

जैसा संकट इस सुनार मां बेटे पर आया था. वही रूप बदलकर हम में से अलग-अलग लोगों के पास आ रहा है. अब यह हम पर है कि हम कैसे अपनों की मदद करते हैं. हमेशा याद रखना है जीवन मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं. हमें हर हाल में आत्महत्या के विरुद्ध खड़े होना है. जीवन संवाद के हर पाठक से विनम्र अनुरोध है कि इस विचार को अधिकतम लोगों तक पहुंचाएं. जीवन ही अंतिम सत्य है. दूसरा कोई रास्ता नहीं.

शुभकामना सहित ...

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