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#जीवनसंवाद: प्रेम में हिंसा, हिंसक प्रेम!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 18, 2019, 5:00 PM IST
#जीवनसंवाद: प्रेम में हिंसा, हिंसक प्रेम!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: आपका जीवन सबसे कीमती है, उसे किसी का अंत करने जैसे काम में मत लगाइए. अगर, इसके बाद भी मन न माने तो कभी जेल की ओर चले जाइए. कैदियों से मिलेंगे तो पता चलेगा हिंसा से कितना कुछ पीछे छूट जाता है.

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  • Last Updated: November 18, 2019, 5:00 PM IST
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बात थोड़ी पुरानी है. मुझे बताया गया कि किसी रिश्तेदार के यहां हिंसा हुई है. नवविवाहिता पर. जानकारी देने के साथ यह कहा गया कि इस बारे में किसी से कुछ न कहूं. इससे उनके साथ 'संबंध' प्रभावित हो सकते हैं. लेकिन, ऐसा करना मेरे स्वभाव में नहीं है. मैंने तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप किया. इसका परिणाम यह हुआ कि अगले छह महीने तक हमारे उनके साथ संबंध सामान्य नहीं हो पाए. इसे उनके आंतरिक मामले में दखल माना गया. जबकि अपना नियम स्पष्ट है, अगर किसी के साथ गलत व्यवहार हो रहा है तो उसी समय यह विषय 'आंतरिक' की श्रेणी से बाहर आ जाता है. इस तरह की हिंसा को चुपचाप बर्दाश्त कर लेना भी इसके जारी रहने का बड़ा कारण है.

हमारे देश में बड़ी संख्या में बेटियां, बहुएं इसीलिए हिंसा का शिकार होती रहती हैं; क्योंकि उनकी हिंसा को आंतरिक मान लिया जाता है. यही विचार बड़ा होते-होते ऑनर किलिंग (प्रतिष्ठा के लिए हत्या) में बदल जाता है. समाज में इसे अघोषित रूप से सही मान लिया गया है. समय-समय पर हमारे सामने अलग-अलग राज्यों से इस तरह की रिपोर्ट आती रहती है.

17 नवंबर 2019 के 'टाइम्स आफ इंडिया' में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2001 से लेकर 2017 के बीच भारत में होने वाली हत्याओं में प्रेम संबंधों के कारण होने वाली हत्या, तीसरे नंबर पर है. इस अवधि में देशभर में 44,412 हत्याएं हुईं. इन हत्याओं का कारण अंतर जाति विवाह, प्रेम संबंध से लेकर लेकर सामाजिक मान्यता तक फैला हुआ है.

हम किसी से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उससे उसके जीवन का अधिकार कैसे छीन सकते हैं. हिंसा बहुत छोटी-छोटी चीजों से जीवन में प्रवेश करती है. इसलिए, अगर उसे समय पर न संभाला जाए तो वह सुखमय जीवन को दुख के भंवर की ओर धकेल देती है.


अगर परिवार के किसी सदस्य ने परिवार की अनुमति, रजामंदी के बिना विवाह कर लिया तो इसमें कुछ हद तक नाराजगी स्वाभाविक है. लेकिन नाराजगी इतनी बढ़ जाए कि हम संबंधित व्यक्तियों को मौत की सजा देने लगे? यह एक किस्म का पागलपन, दिमाग का हिंसा से भरा होना ही है. जब तक हम मनुष्य और जीवन से बड़ा किसी भी मूल्य, विचार को मानते रहेंगे हम जीवन को समझने से दूर रहेंगे.


छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, अपनी जिद पर कायम रहना. लिंग के आधार पर श्रेष्ठता का विचार भारत में बच्चों में पनपने वाली हिंसा का मूल कारण है. लड़के का चिल्लाना हमें बहुत खराब नहीं लगता, लेकिन लड़की को चिल्लाते हुए देखकर हमें अजीब लगता है. यह ठीक वैसा ही है जैसे लड़की को रोते देख कर हमें सामान्य लगता है, लेकिन लड़के को रोते देख कर हम 'घबरा' जाते हैं. हम कहने लगते हैं, क्या लड़कियों की तरह रोते हो. लेकिन किसी बच्चे/ लड़के को चिल्लाते, मारपीट करते देखकर कभी नहीं कहते, लड़कियों की तरह थोड़ा सभ्य बनो. हमें अपने व्यवहार की जांच करनी होगी, विचार को परखना होगा. उनसे ही तो अनजाने में मन कठोर, हिंसक होता जाता है.
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बड़ों को देखकर ही बच्चे हमारे जैसे बनते जाते हैं. बिना हमारे सिखाएं वह ऐसी चीजें सीखते जाते हैं, जो हम कर रहे हैं. अगर हमारे विचार में हिंसा है, तो वह बच्चों के मन से दूर नहीं रह सकती. कितना भी गुस्सा आए, मन उबलने ही लगे, उस वक्त भी ध्यान रखें, आपका जीवन सबसे कीमती है, उसे किसी का अंत करने जैसे काम में मत लगाइए. अगर, इसके बाद भी मन न माने तो कभी जेल की ओर चले जाइए. कैदियों से मिलेंगे तो पता चलेगा हिंसा से कितना कुछ पीछे छूट जाता है.
पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 18, 2019, 9:17 AM IST
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