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#जीवन संवाद : तुम्‍हारा स्‍वभाव!

News18Hindi
Updated: March 11, 2020, 1:32 PM IST
#जीवन संवाद : तुम्‍हारा स्‍वभाव!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad:सबसे बड़ा संकट दूसरे को बदलने का है. दूसरे के हिसाब से खुद को बदलने, साथ चलने का हुनर हम पीछे छोड़ आए हैं. हर कोई जब दूसरे को बदलने की जिद करके बैठा रहेगा तो रिश्‍ते में प्रेम, स्‍नेह कहां से आएगा.

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  • Last Updated: March 11, 2020, 1:32 PM IST
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‘मैं तो कोशिश करती रही लेकिन उनका स्‍वभाव नहीं बदला. जब स्‍वभाव नहीं बदला तो मेरे पास रिश्‍ते से बाहर जाने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं रहा.’ उदयपुर से राधिका श्रीवास्‍तव ‘जीवन संवाद ‘ को लिखती हैं कि जब सामने वाले का स्‍वभाव नहीं बदला जा सके तो रिश्‍ते निभाना मुश्किल हो जाता है.

राधिका अकेली नहीं हैं. इस समय हमारा सबसे बड़ा संकट यही है कि हम दूसरे का स्‍वभाव तो पूरी तरह से बदलना चाहते हैं लेकिन अपनी ओर हमारा ध्‍यान नहीं है. जब तक अपनी ओर ध्‍यान नहीं होगा, दूसरे को बदलने की हजार कोशिश का कोई असर नहीं होगा. किसी को बदलना आसान नहीं होता. क्‍यों! इसलिए क्‍योंकि बदलने की एक उम्र होती है.

अब तक मैं जितने भी लोगों से मिला हूं किसी को यह कोशिश करते नहीं पाया कि वह अपना स्‍वभाव बदलने के प्रयास में है. हम सब केवल यही कोशिश करते हैं कि किसी तरह सामने वाले का व्‍यवहार बदल जाए. यह भूलते हुए कि जिस तरह हम किसी को बदलना चाहते हैं, वैसे ही हमें बदलने के लिए बेचैन रहने वालों की कमी नहीं!

सबसे बड़ा संकट दूसरे को बदलने का है. दूसरे के हिसाब से खुद को बदलने, साथ चलने का हुनर हम पीछे छोड़ आए हैं. हर कोई जब दूसरे को बदलने की जिद करके बैठा रहेगा तो रिश्‍ते में प्रेम, स्‍नेह कहां से आएगा.




बात चाहे पति/पत्‍नी की हो, दोस्‍तों की हो. दूसरे को वैसे स्‍वीकार करना ही सबसे बढ़िया जीवनशैली है, जैसा वह है. समंदर, नदी से मिलते हुए शर्त तय नहीं करता. वह मिलता है. क्‍योंकि किसी को बदलकर उससे नहीं मिला जा सकता. पाब्लो नेरुदा (सवालों की किताब) लिखते हैं, सारी नदियां अगर हैं मीठी, तो समन्दर कहां से लाता है, अपना नमक?

नमक, समंदर का स्‍वभाव है. नदियां उससे मिलते हुए उसका स्‍वभाव नहीं पूछतीं. उनकी तमन्‍ना मिलने की होती है, समंदर का मिजाज बदलने की नहीं. इसके उलट हमारा जोर एक-दूसरे को बदलने पर है. यहीं से तनाव, मनमुटाव शुरू होता है.

समंदर से मुझे गहरा लगाव है. समंदर का व्‍यक्तित्‍व मुझे बहुत लुभाता है. कितना शांत, समावेशी है वह. उसमें जितनी गहराई है, काश! उसका थोड़ा सा हिस्‍सा भी हमें मिल जाए तो हमारे अनेक सवाल अपने आप ही हल हो जाएं.


परिवार में कलह, एक-दूसरे को बदलने की जिद. एक-दूसरे को न सुनने/समझने की कमी. समंदर के ख्‍याल में आते ही छूमंतर हो सकती है. लेकिन हम अपने पर्यावरण से सीखते नहीं. उसकी बातें तो खूब सारी करते हैं, लेकिन उनके मूल्‍य को जीवन में उतारते नहीं. प्रकृति के पास हमारे सभी प्रश्‍नों का उत्‍तर है. बस, ध्‍यान से उसे सुनने की जरूरत होती है. हम दुनिया के पीछे भागने, उसके जैसा होने से थोड़ा-सा वक्‍त अपने लिए निकाल सकें तो जिंदगी के मायने बदल सकते हैं. उससे संकट के बादल अपने आप छंट जाएंगे. दूसरों को नहीं बदलना है. अगर कुछ बदलने और बचाने योग्‍य है तो केवल अपना स्‍वभाव!

दयाशंकर मिश्र
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First published: March 11, 2020, 1:32 PM IST
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