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#जीवन संवाद: जो नहीं है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 11, 2019, 11:35 AM IST
#जीवन संवाद: जो नहीं है!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: ख्वाहिशों के होने में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं, लेकिन वह दूसरे की नकल नहीं होनी चाहिए. जो दूसरे की नकल है वह हमारी इच्छा नहीं है. इसलिए उसका पूरा होना संभव नहीं. आज एक इच्छा पूरी करेंगे, तो कल दूसरी सामने आ जाएगी. परसों तीसरी, उसके बाद यह सिलसिले कभी खत्म नहीं होंगे.

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  • Last Updated: October 11, 2019, 11:35 AM IST
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मन कहां भागता है? उस तरफ, जो हमारे पास नहीं है. यह कोई नई बात नहीं, ऐसा तो हमेशा से ही होता रहा है. अंतर केवल इतना आ गया है कि पहले इस पर नियंत्रण लगाने के लिए हमारे पास बड़े, बुजुर्ग हुआ करते थे. अब हम सारे निर्णय स्वयं ले रहे हैं. हम ऐसे समय में निर्णय ले रहे हैं, जब हमें हर वह चीज़ पुरानी लगती है, जो हमने हासिल कर ली है. हमारे भीतर की ऊब बढ़ चली है. कर्ज़ इस समय का सबसे ताज़ा फैशन है. इससे मन, नजर का उस तरफ दौड़ना स्वाभाविक हो गया है, जो हमारे पास नहीं है.

एक छोटा सा किस्सा सुनते हैं. कुछ समय पहले मनोवैज्ञानिकों ने एक सुंदर प्रयोग किया. एक होटल में शानदार स्विमिंग पूल बनवाया गया. उसमें चारों तरफ कीमती टाइल्स लगवाईं. सब कुछ अत्यंत सलीके से तैयार किया गया. कमी, बस इतनी रह गई कि एक जगह टाइल में दरार आ गई. उसे सुधारना संभव नहीं था, इसलिए वहां पर दूसरे रंग की टाइल्स लगा दी गई. जो भी इस जगह पहुंचता, टाइल्स और डिजाइन की सराहना किए बिना नहीं रह पाता. लेकिन जैसे ही नजर उस 'दूसरी' टाइल्स पर पड़ती, लोग तुरंत सुंदरता, डिजाइन के प्रयोग को छोड़कर कमी पर बात करने लगते.

यह एक मनोवैज्ञानिक बाधा है. हमारा ध्यान उस कमी पर ही अटका रहता है, जो नहीं है. इसलिए इस प्रयोग को 'मिसिंग टाइल सिंड्रोम' (Missing Tile Syndrome) नाम दिया गया. हमारा मन इस सिंड्रोम की तरह अपने को छोड़कर चीज़ों की तरफ भागता रहता है, जो हमारे पास नहीं है.


इसको रोका कैसे जाए? यह सरल तो नहीं है, लेकिन इतना मुश्किल भी नहीं है कि इसके साथ हमारी गुजर-बसर न हो सके. हमें इस बात को समझना होगा कि हमारा जीवन 'प्रीपेड' मोबाइल सिम की तरह है. जितना समय तय हो गया, उससे अधिक एक क्षण भी नहीं. हम सब निश्चित समय के लिए यहां हैं. ऐसे में हजारों ख्वाहिशों के बीच क्या ऐसा है, जिसकी आवाज सीधी दिल से निकलती है, उसको सुने और चुने बिना जीवन को आनंदित तरीके से जिया नहीं जा सकता.

ख्वाहिशों के होने में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं, लेकिन वह दूसरे की नकल नहीं होनी चाहिए. जो दूसरे की नकल है वह हमारी इच्छा नहीं है. इसलिए उसका पूरा होना संभव नहीं. आज एक इच्छा पूरी करेंगे, तो कल दूसरी सामने आ जाएगी. परसों तीसरी, उसके बाद यह सिलसिले कभी खत्म नहीं होंगे.



इसलिए बहुत जरूरी है कि हम जो हैं, जो होना चाहते हैं उसकी स्पष्टता से जांच करें. बार-बार बदलने से ख्वाहिशें कम नहीं होतीं, हां भटकने के लिए हजार रास्ते खुल जाते हैं. इसलिए जो हमारे पास, हमारे भीतर है, उसकी आहट को सुनना है. गहरे कान लगाकर! जो नहीं हो उसके लिए भटकने से अच्छा है कि जो है उसे संपूर्ण बनाया जाए.

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जो नहीं है, जिसकी कमी है. उसकी ओर ध्यान बार-बार जाना इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि हम ऐसे ही वातावरण में तैयार किए गए हैं. लेकिन इसके मायने यह तो नहीं कि जिंदगी यूं ही गुजर जाए. जो नहीं है, उस कमी को अपने भीतर की रिक्तता बनने से रोकना होगा. बहुत से लोग इस हीन भावना से उम्रभर नहीं उबर पाते! धीरे-धीरे यह कुंठा, उदासी और अवसाद की ओर बढ़ जाती है.

इसलिए, संपूर्णता की तलाश को नए तरीके से समझने की जरूरत है. असल में संपूर्ण जैसी कोई चीज प्रकृति ने बनाई नहीं. हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं, निर्भरता कोई खराब शब्द नहीं है, हां हमने उसे सही तरीके से समझा नहीं, उसका उपयोग नहीं किया. इस बारे में विस्तार से संवाद फिर कभी आज बस इतना ही. अपने होने को खोजिए, उससे प्रेम कीजिए.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 9, 2019, 10:34 AM IST
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