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#जीवनसंवाद: अपने बारे में कुछ ठोस!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 16, 2019, 10:27 AM IST
#जीवनसंवाद: अपने बारे में कुछ ठोस!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जैसे हम एक दिन में नहीं बनते, ठीक वैसे ही हम एक दिन में नहीं बदलते! हमारा मन, विचार और कर्म धीमी आंच पर पकने वाले व्यंजन की तरह हैं. धीमे-धीमे ही इनका निर्माण होता है.

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  • Last Updated: October 16, 2019, 10:27 AM IST
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दूसरों को सलाह देना दुनिया में संभवत: सबसे सरल काम है. सलाह देकर आप आगे बढ़ जाते हैं. सही होने पर सारा श्रेय आपका, ऐसा न होने पर भी कुसूरवार वही, जिसे सलाह दी गई थी. हमारी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा दूसरों को सलाह देने, उन्हें अपने अनुसार ढालने में निकल जाता है. मजेदार बात यह है कि हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि दूसरों को क्या करना चाहिए, लेकिन हमें स्वयं क्या करना चाहिए, इसके बारे में हमारे पास कोई ठोस नजरिया नहीं होता. ‌‌‌‌‌‌

किसी का दिल टूटा है, पति-पत्नी के बीच तनाव है. परिवार में अनबन है. ऐसे सभी प्रश्नों के लिए हमारे पास सुझावों का महासागर होता है. कमी बस इतनी रहती है कि अपनी जिंदगी की शुष्कता के लिए हमारे पास एक 'झील' तक नहीं होती. इसलिए, सबसे ज्यादा जरूरत स्वयं पर ध्यान देने की है. हमारे भीतर अपने लिए स्नेह का बोध, आत्मीयता की कमी से उपजने वाली हिंसा, गुस्से से निपटना सरल नहीं है.

जैसे हम एक दिन में नहीं बनते, ठीक वैसे ही हम एक दिन में नहीं बदलते! हमारा मन, विचार और कर्म धीमी आंच पर पकने वाले व्यंजन की तरह हैं. धीमे-धीमे ही इनका निर्माण होता है. इसलिए इनके स्वाद में लंबी अवधि में परिवर्तन संभव है.


दूसरों की पीछे भागते रहने, उन्हें अपने अनुसार परिवर्तित करते रहने, उन्हें कैसा जीवन की जीना चाहिए, इन सब कोशिशों मैं अपना समय लगाने से कहीं अधिक बेहतर है, हमें कैसे जीना चाहिए इसका ठोस उत्तर!

लखनऊ से 'जीवन संवाद ' को लिखे ईमेल में अर्पिता यादव कहती हैं, 'काश! अपने बारे में उतना सोच पाते, जितना दूसरों के बारे में सोचते रहते हैं.' यह एकदम सही बात है. मैं इससे सौ प्रतिशत सहमत हूं. हमारी बहुत सारी ऊर्जा नकारात्मक चिंतन में खर्च होती है. हम जिन्हें पसंद नहीं करते, अक्सर उनके बारे में बहुत सारी जानकारी जुटाते रहते हैं.



हमारे साहित्य में वैसे तो विधिवत नौ प्रकार के रस ही बताए गए हैं. लेकिन निंदा भी हमारे जीवन का अनूठा रस है, जिसके बिना जीवन अधूरा है. निंदा में जो रस मिलता है, वह अच्छे-अच्छे व्यंजन, श्रेष्ठतम उपहार में भी नहीं! जब हम दूसरों को 'कैसे' जीना है, यह बता रहे होते हैं, तो एक प्रकार से उनकी आलोचना भी कर रहे होते हैं. हमारे अंतर्मन में चल रहा होता है, इनका तरीका श्रेष्ठ नहीं है. असल में श्रेष्ठ वह है, जो हम बता रहे हैं.

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इसी जीवनशैली से हमारा 'फोकस' दूसरे की ओर चला जाता है. हम 'स्व' में स्थित न होकर, दूसरे पर केंद्रित हो जाते हैं. इससे हमारी बहुत सारी ऊर्जा, सकारात्मकता, सहजता प्रभावित होती है. हम खुद को कहांं, कैसे देखना चाहते हैं, पूरी शक्ति से इसमें ही जुटना चाहिए. उसमें नहीं, जो हम नहीं चाहते. इसलिए कभी-कभी दुनिया से खुद को 'दूर' कर लेना अपने मन और चिंतन के लिए हितकार होता है. जब भी आपको लगे बाहर कुछ गड़बड़ है, अपने भीतर की ओर चले जाइए. हमारे अधिकांश प्रश्नों का उत्तर यहीं पर है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: October 15, 2019, 10:18 AM IST
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