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#जीवनसंवाद: जीना सीखना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 21, 2019, 5:59 PM IST
#जीवनसंवाद: जीना सीखना!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हमारे बचपन में संघर्ष का मूल्य कहीं अधिक गहरा था. अब हम खुद, अपने बच्चों को ऐसे वातावरण की ओर ले जा रहे हैं जहां 'ग्लैमर' सबसे बड़ी बात है.

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  • Last Updated: October 21, 2019, 5:59 PM IST
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सुनने में यह बात अटपटी लग सकती है, लेकिन यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा बदलाव है कि हम जीवन के प्रति आस्था से दूर हो रहे हैं. जीवन का आर्थिक स्थितियों से इतना गहरा संबंध नहीं है, जितना हम मान बैठे हैं. अगर हम अपने पिता, दादा के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिता सकें तो हम इस बात को गहराई से समझ सकेंगे.  ‌

मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे यह अवसर मिला. पिता उन स्थितियों से आगे बढ़े, जहां अच्छे-अच्छे स्वप्न आशा खो बैठते हैं. इसलिए, मेरे विश्वास की वजह ठोस है. मुश्किल परिस्थितियों में हमने देखा है कि मन पर नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण है.
हमारे बचपन में संघर्ष का मूल्य कहीं अधिक गहरा था. अब हम खुद, अपने बच्चों को ऐसे वातावरण की ओर ले जा रहे हैं जहां 'ग्लैमर' सबसे बड़ी बात है. शनिवार को 'जीवन -संवाद 'के एक छोटे से सत्र में दिल्ली की एक मां ने बहुत महत्वपूर्ण आत्म स्वीकृति साझा की.




नई दिल्ली, बंगला साहब गुरुद्वारे के पास रहने वाले एक परिवार पर लगभग तीस वर्ष पहले गहरा संकट आया. परिवार के मुखिया एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई. मां पर पांच बच्चों के लालन पोषण की जिम्मेदारी थी. रिश्तेदारों, पड़ोसियों से निश्चित समय के बाद मदद मिलनी बंद हो गई. परिवार की हालत ऐसी थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल काम था. कुछ महीनों तक खाने-पीने का प्रबंध आसपास के लोग करते रहे, धीरे-धीरे सबने हाथ खींचने शुरू कर दिए. उस वक्त मां के सामने मुश्किल वक्त था. आज हम देख रहे हैं थोड़े-थोड़े संकट में मां अपने साथ बच्चों को जहर दे रही हैं. तनिक तनाव बढ़ते ही जीवन समाप्त करने का निर्णय ले रही हैं.

इस मां ने पांचों बच्चों को पालने का निर्णय लिया, किसी भी कीमत पर. उनके मन में कभी भी जीवन से पीछा छुड़ाने का भाव नहीं आया. बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे, रहने का इंतजाम भी किसी तरह था. मुख्य प्रश्न, भोजन का प्रबंध था. मां ने मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद मुश्किल रास्ता चुना. उन्होंने सुबह शाम भोजन के लिए बंगला साहब का रुख करना शुरू कर दिया. वहां से मिलने वाले भोजन से बच्चे बड़े हुए. सिलसिला लगभग पंद्रह वर्ष तक चला. भोजन के इस तरह प्रबंध के लिए मां ने समाज से क्या कुछ नहीं सुना होगा. इसकी कल्पना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन उन्होंने जीवन से पलायन नहीं चुना. संघर्ष चुना, समर्पण नहीं. जिंदा रहना चुना आत्महत्या नहीं. मां के हौसले, संघर्ष, प्रेम को सलाम!

यह किस्सा हमें इन पांच बच्चों में से एक ने सुनाया. वह 'डियर जिंदगी जीवन संवाद' से जुड़ी सुपरिचित, चिंतित पाठक की अनन्य सखी हैं. दोनों एक ही स्कूल में पढ़ी हैं. बचपन की सहेली हैं. हमें मिले जीवन अनुभव संपूर्ण, सच्चे हैं.

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तनाव, डिप्रेशन और आत्महत्या का  जीवन के संकट से उतना अधिक संबंध नहीं है, जितना इसके मनोवैज्ञानिक 'संकट' से है. हम मुश्किल से लोहा लेने की कला भूल रहे हैं! 
हमने हर चीज को 'अपनी' अर्थव्यवस्था से जोड़ लिया है. यह महत्वपूर्ण पक्ष है लेकिन सब कुछ नहीं है. हमारा सब कुछ, केवल जीवन की आस्था है. इसकी रक्षा करिए, शेष अपने आप शुभ, मंगल और कल्याणकारी हो जाएगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 21, 2019, 8:13 AM IST
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