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#जीवनसंवाद: रिश्तों की गठरी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 25, 2019, 11:01 AM IST
#जीवनसंवाद: रिश्तों की गठरी!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हम एक-दूसरे के संपर्क में हैं, लेकिन एक-दूसरे के साथ नहीं हैं. इस जीवनशैली की हमें अकेलेपन की ओर धकेलने में सबसे बड़ी भूमिका है! तकनीक हमारे मिलने-जुलने का विकल्‍प नहीं हो सकती. यह समझने में हम जितनी अधिक देरी करते जाएंगे, अपने लिए उतनी ही मुश्किल दुनिया बनाते जाएंगे.

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  • Last Updated: October 25, 2019, 11:01 AM IST
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सपनों की लंबी, अनवरत सूची ने रिश्तों को हमारे अनुमान से कहीं अधिक नुकसान पहुंचाया है. रिश्‍तों की गठरी धीरे-धीरे हल्‍की होती जा रही है. हमारा सामाजिक ताना-बाना जो एक-दूसरे के साथ बहुत सहजता से जुड़ा हुआ था, हर दिन कमजोर होता जा रहा है. दूसरे समाजों की ओर हम इतना अधिक देखने लगे कि अपनी खूबियों से दूर होने की कगार पर पहुंच गए. इसे सरलता से ऐसे समझें कि हम अपने परिवार, रिश्‍तेदारों, दोस्‍तों के सुख-दुख में कितना शामिल रहे रहे हैं!

मुझे बहुत अच्‍छे से याद है कि एक समय शादी, ब्‍याह, सुख-दुख में परिवार के हर व्‍यक्ति का हिसाब होता था. अरे, वह क्‍यों नहीं आए. उसे भी ले आते तो अच्‍छा होता. सबसे मिलना हो जाता! यह बात हर छोटे-बड़े व्‍यक्ति, हर समरोह पर लागू होती है. धीरे-धीरे हमारी हिस्‍सेदारी परिवार से घट कर एक व्‍यक्ति तक पहुंच गई. परिवार से कोई एक पहुंच गया तो ठीक है. नहीं पहुंचा तो भी चल जाता था. अब सुख-दुख में हिस्‍सेदारी वीडियो कॉल से होते हुए फोन तक पहुंच गई.

हम एक-दूसरे के संपर्क में हैं, लेकिन एक-दूसरे के साथ नहीं हैं. इस जीवनशैली की हमें अकेलेपन की ओर धकेलने में सबसे बड़ी भूमिका है! तकनीक हमारे मिलने-जुलने का विकल्‍प नहीं हो सकती. यह समझने में हम जितनी अधिक देरी करते जाएंगे, अपने लिए उतनी ही मुश्किल दुनिया बनाते जाएंगे.

पहले हम एक-दूसरे को कुरेद-कुरेद कर उसकी पीड़ा, दुख समझने की कोशिश में लगे रहते थे. किसी को अकेला छोड़ने की बात हमारे दिमाग में कहीं नहीं होती थी बल्कि हम कभी ऐसे सोचते ही नहीं थे कि किसी को उसके हाल पर छोड़ा जा सकता है.


सबकी सोच मोटे तौर पर एक जैसी होने के कारण सबसे बड़ा लाभ यह था कि कोई अकेला नहीं था. सब एक-दूसरे के साथ थे. हम एक-दूसरे के साथ होकर ही अकेलेपन, तनाव और उदासी का सलीके से सामना कर सकते हैं.

यह भला कैसे संभव है कि हम किसी के घर न जाएं. दूसरों से न मिलें. उनके सुख–दुख में न दिखें लेकिन सब हमारे साथ रहें. इस सोच से अकेलेपन को हराना संभव नहीं.

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अकेलापनन हमारे एक-दूसरे का साथ छोड़ने से ही उपजा है. इसलिए, जैसे ही हम एक-दूसरे का साथ गहराई से देने लगेंगे, हम अपनी प्रसन्‍नता, आनंद के उस स्‍तर की ओर वापस लौट सकते हैं, जहां से भटक गए हैं. रिश्‍तों की गठरी को संभालने की जिम्‍मेदारी हम सबकी है. हमें अपने हिस्‍से का थोड़ा-थोड़ा स्‍नेह, प्रेम और आत्‍मीयता को दूसरों के साथ बांटने का काम सजगता से करने की जरूरत है.


स्‍नेहन से दूर होने के कारण ही हम एक-दूसरे से अपना दुख साझा करने में संकोच करने लगे हैं. मन का बोझ हल्‍का नहीं होने के कारण वह भारी होने लगता है. यह भारीपन ही हमें घुटन की ओर धकेलने का काम करता है. इसलिए, आसपास बिखरे सन्‍नाटे को तोड़ना सबसे पहला कदम होना चाहिए. दूसरों को साथ लीजिए, उनका साथ दीजिए. अपने मन की बात कहने से डरिए नहीं. जिन लोगों के हंसने, मजाक उड़ाने के डर से आप अपने मन पर बोझ लादे फिर रहे हैं, उनकी आपके जीवन में भूमिका बहुत छोटी, औपचारिकता से भरी है. हर हाल में रिश्‍तों के प्रति सजग, सहृदय रहिए. दूसरें के लिए नहीं, अपने लिए. जिनसे प्रेम करते हैं, उनके लिए.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 24, 2019, 11:22 AM IST
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