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#जीवनसंवाद : आंखों में आशा के दीपक!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 30, 2019, 1:16 PM IST
#जीवनसंवाद : आंखों में आशा के दीपक!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अपने त्योहारों के मूल संदेश को समझे बिना हम केवल बाजार के हिसाब से जीवन को आगे बढ़ाते रहेंगे. यह जीवन शैली हमें उस आनंद की ओर नहीं ले जा सकती, जिसकी कामना हमारे मन में बसी है.

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  • Last Updated: October 30, 2019, 1:16 PM IST
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दीपावली की रोशनी को जाने मत दीजिए. आंखों में आशा के दीपक जला लीजिए. रोशनी को भीतर तक भर लीजिए. जीवन के आंगन में फेंके जा रहे अंधेरे को मिटाने में आसानी होगी. अंधेरा आएगा ही, बस इतना ध्यान रखना है कि उजालों के मोती आत्मा से अधिक दूर न हों. दीपावली पर पसरे पटाखों के शोर, प्रदूषण के बीच मुझे सिगरेट पीने वालों की याद आ जाती है. कितनी अजीब लत है, पहले धुआं भीतर खींचिए, बाद में बाहर निकालिए. दीपावली पर प्रदूषण का हाल भी कुछ ऐसा ही है. पहले हम खुद चारों ओर प्रदूषण का शोर और सांसो में जहर घोल दें, उसके बाद उस पर चिंता में जुट जाते हैं. हम उन जानवरों, वन्य प्राणियों के बारे में एकदम आंखें मूंद लेते हैं , जो हमारे पर्यावरण का अभिन्न अंग हैं. इस दौरान बहुत ज्यादा परेशानी में रहते हैं.

अपनी परंपरा और आस्था के बीच दीपावली आशा की सतत प्रक्रिया का उत्सव, भरोसा है. भरोसे का उत्सव है. परंपरा में बाजार की मिलावट का सबसे सटीक उदाहरण प्रकाश पर्व हो गया है. रोशनी का पर्व कैसे बाजार ने धीरे-धीरे पटाखों के शोर में बदल दिया. संभव है, कुछ बरस बाद दीपावली केवल पटाखों, खरीदारी से ही मनाई जाने लगे.

प्रकाश और उनमें शामिल आशा का संचार धीरे-धीरे पीछे छूटता जाए. इसलिए, हमें अपने समाज और लोग के बीच लौटना होगा. बाजार, जीवन की कड़वी सच्चाई है. लेकिन हमें संतुलन को नहीं भूलना चाहिए! अमेरिका, इंग्लैंड में बाजार का इतिहास कहीं पुराना है. लेकिन उन्होंने अपने पर्यावरण को हमारी तुलना में कहीं अधिक गंभीरता से संभाले रखा है. पिछले दिनों मुंबई के आरे में जिस चतुराई के साथ जंगल काट दिए गए, वह हमारी व्यवस्था की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं. इस दिवाली हमने बहुत छोटा, विनम्र प्रयोग किया. परिवार के रूप में हमने तय किया कि हम कोई खरीदारी नहीं करेंगे. क्योंकि यह एक बिना वजह की रस्म बनती जा रही है. भेड़ चाल से दूर किए बिना स्वयं को भेड़ होने से रोकना संभव नहीं. दुनिया के हिसाब से चलने का मतलब खुद को फोटो कॉपी में बदलते जाना नहीं है.

ध्यान दीजिए, कैसे धीरे-धीरे हमारे जीवन से तालाब, नदी और जंगल गायब कर दिए गए. सब हमारे जीवन में सुख के नाम पर मिटाए गए.


मजेदार बात है कि आज हम उसी सुख के लिए सबसे अधिक बेचैन हैं. पानी और साफ हवा को हमने सबसे कम महत्व दिया. अब दोनों हमसे दूर है. साफ हवा, पानी के लिए हम मोटी कीमत चुका रहे हैं. जबकि कुछ समय पहले की बात है, यह दोनों एकदम मुफ्त में उपलब्ध थीं.

समाज का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे पर्यावरण से खुद को दूर करता जा रहा है. उसे लगता है, विकास के लिए यह जरूरी चीज है. इसका कोई विकल्प नहीं.


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ऐसे लोगों से हम केवल यही निवेदन कर सकते हैं कि जितना ध्यान आप अपने छोटे से घर, कॉलोनी की हरियाली का रखते हैं, ताकि आपको थोड़ी शीतलता, कोमलता, शांति का एहसास होता रहे, वही भाव समाज के लिए चाहिए. जीवन के प्रति इसी सोच के चलते हम समाज से कटे, अकेले होते गए.

दीपावली, अपने त्योहारों के मूल संदेश को समझे बिना हम केवल बाजार के हिसाब से जीवन को आगे बढ़ाते रहेंगे. यह जीवन शैली हमें उस आनंद की ओर नहीं ले जा सकती, जिसकी कामना हमारे मन में बसी है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 29, 2019, 8:59 AM IST
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