#जीवनसंवाद: दिमाग की खूंटी!

#जीवनसंवाद: दिमाग की खूंटी!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: नन्हे हाथी को एकदम पतली सी जंजीर में बांध दिया जाता है, जिससे उसे अहसास बना रहे कि वह कहीं जा नहीं सकता. वह स्वतंत्र नहीं है. यह भ्रम इतना शक्तिशाली हो जाता है कि बड़ा होने पर भी हाथी मामूली सी जंजीर/रस्सी से बंधा रहता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 11, 2020, 11:20 PM IST
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हमारा मन विचित्र प्रकार की खूंटियों से बंधा रहता है. इसे बचपन में ही ऐसी कुशलता के साथ बांधा जाता है कि बड़े होने पर कितने ही प्रयास कर लिए जाएं, इससे निकलना मुश्किल ही जान पड़ता है. यह खूंटियां इतनी शक्तिशाली हैं कि बड़े से बड़े हाथी भी इन्हें नहीं तोड़ पाते. जिस तरह नन्हे हाथी को एकदम पतली सी जंजीर में बांध दिया जाता है जिससे उसे अहसास बना रहे कि वह कहीं जा नहीं सकता. वह स्वतंत्र नहीं है. यह भ्रम इतना शक्तिशाली हो जाता है कि बड़ा होने पर भी हाथी मामूली सी जंजीर/रस्सी से बंधा रहता है.

हम उस विशाल हाथी की मासूमियत पर हंसते-हंसते उसके जैसे ही होते जा रहे हैं. अक्सर दूसरों को बड़े ध्यान से देखने पर उनके विचारों की छाया हम पर पड़ने लगती है, अगर हम भीतर से सजग नहीं हैं. एक दशक पहले मैं जिस कंपनी में काम करता था. वहां स्वयं को प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त करने, पर्याप्त नाटकीयता का हुनर रखने वाले व्यक्ति हुआ करते थे. हर बात को कैसे नाटकीय बनाया जा सकता है. उनसे सरलता से सीखा जा सकता था.

यह बात अलग है कि मेरी उसमें रुचि नहीं थी. लेकिन नब्बे प्रतिशत लोगों की उसमें रुचि थी. रुचि से अधिक प्रश्न था ऐसी जंजीरों का जिनसे वह लोगों के मन बांध लेते थे. लोग उनका नाम लेकर दुखी रहते. अपने दांपत्य, पारिवारिक जीवन को संकट में डालते रहते. लेकिन किसी में यह साहस नहीं था कि वह उनकी जंजीरों को तोड़ सकें. जबकि उनकी जंजीरें बहुत कमजोर थीं.




वर्षों तक लोग उनके दुखों का बखान करते-करते, उनसे दुखी होते-होते धीरे-धीरे उनके जैसे होते गए. इस समय वह इस दुनिया का हिस्सा नहीं हैं. लेकिन उनकी जंजीर लोगों के मन में इतनी गहरी है कि उनके शिष्य कभी उससे मुक्त नहीं हो सकते.



गुलामी से मुक्ति आसान नहीं. दिमाग की जंजीरों से मुक्ति के लिए हमारे पास पर्याप्त दृष्टि नहीं है! दिमाग थोपे गए विश्वास, डर और आत्मविश्वास के कमजोर बंधन जीवन भर नहीं तोड़ पाता. लाखों-करोड़ों लोग बेचैनी और दुख से तड़पते हैं लेकिन उन बंधनों को नहीं तोड़ पाते जो कमजोर खूंटी से बंधे हैं, जिसे एक ही पल में तोड़ा जा सकता है! एक छोटी सी कहानी कहता हूं. संभव है, इससे मेरी बात और अच्छी तरह स्पष्ट हो पाएगी.


एक साधक ध्यान की खोज में घने जंगल में एक आश्रम में रहा करता था. वहां सब कुछ ठीक था लेकिन चूहे बहुत ज्यादा थे. चूहों का खेल कूद साधक के ध्यान में बाधा उत्पन्न करता. कुछ दिन तक वह सहता रहा. इसी बीच एक नया साधक वहां आया. पुराने साधक ने कहा इसका कुछ प्रबंध करो. नए साधक के एक मित्र के यहां कई बिल्लियां थीं. वह उसके यहां से एक बिल्ली ले आया. अगले दिन से जब साधक ध्यान करने बैठते बिल्ली को पास में बांध देते. बंधे रहने से धीरे-धीरे बिल्ली आलसी हो गई. लेकिन उसका खौफ इतना था कि कोई चूहा वहां आने की हिम्मत नहीं करता. बिल्ली को बिना किसी काम के शांति से भोजन मिल जाता. साधक गहरी शांति से साधना में लीन हो जाते.

धीरे-धीरे बिल्ली और साधना दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची हो गए. बिना बिल्ली के साधना संभव न हो पाती. कई वर्ष बीते. साधक आते और चले जाते. ध्यान चलता रहा, बिल्ली बनी रही. एक दिन बिल्ली लाने वाले साधक ने अंतिम सांस ली. उसके शिष्य ने गद्दी संभाली. वह भी गुरु के समान ध्यान कक्ष में बिल्ली बंधे रहने देता. एक दिन बिल्ली बूढ़ी होकर मर गई. गुरु ने तुरंत नई बिल्ली मंगवाई. एक दिन साधना रोकनी पड़ी क्योंकि बिल्ली के बिना साधना कैसे होती.

अब धीरे-धीरे आश्रम के लोग भूल गए थे कि बिल्ली चूहे के लिए आई थी. अब बिल्ली उनके लिए साधन का जरूरी सामान बन गई. इसी तरह पीढ़ी दर पीढ़ी उस आश्रम की यह परंपरा बन गई. किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि ध्यान के समय बिल्ली क्यों जरूरी है? क्योंकि ध्यान जितना ही ध्यान बिल्ली पर था. बिल्ली के होने से ही सारी समस्या के दूर होने का विश्वास था. वहां आज भी बिल्ली के बिना साधना अधूरी है. ज़रा मन को टटोलिए, एक नहीं सैकड़ों बिल्लियां मिल जाएंगी. बस ध्यान से देखने की जरूरत है.

शुभकामना सहित....

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