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#जीवनसंवाद: शहर, गांव और तनाव!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 23, 2019, 9:28 AM IST
#जीवनसंवाद: शहर, गांव और तनाव!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: अब शहर में अपनी जड़ों से कटे मन को एक-दूसरे के अहंकार और ईर्ष्या का भी सामना करना पड़ता है. अकेले मन के लिए यह सब सहना आसान नहीं है. इसीलिए तो मन टूट रहा है.

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  • Last Updated: October 23, 2019, 9:28 AM IST
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हमारी मुश्किल चीज़ों को सहने की क्षमता कम होती जा रही है. यह अभ्यास से अधिक स्वभाव की बात है, कुछ लोग 'समय' के हिसाब से अपने को ढाल लेते हैं. 'सहना' उनके स्वभाव में होता है, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में हमें ऐसे लोग मिल रहे हैं, जो प्रसन्नता को अपने अनुकूल रहने से ही जोड़कर देखते हैं. शहरों के पुराने, बड़े होने के साथ ही वहां रहने वालों की मानसिक क्षमता में तेजी से कमी आ रही है. अंतत: हम सब आए तो गांव से ही हैं. भारत में ऐसे लोगों को खोज पाना मुश्किल है, जिनका गांव से संबंध कभी न रहा हो. धीरे-धीरे कम होता गया, लेकिन गांव से उनका जुड़ाव न रहा हो, यह बड़ा कठिन है.

कितनी खूबसूरत बात है कि जब तक गांव भरे-पूरे थे, अस्पताल, बीमारी कम थी. बचपन  मुश्किल में बीतता था लेकिन पांच-दस साल के बाद बाकी जीवन स्वस्थ था.
जीवन के तनाव तब भी कम नहीं थे. रोटी कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी चीजें आज के मुकाबले कहीं अधिक मुश्किल ढंग से मिलती थीं. उसके बाद भी गांव मनुष्य को सुख-दुख सहने की क्षमता, संघर्ष की धूप सहने की क्षमता बखूबी सिखाते हैं.


धीरे-धीरे गांव खाली होते गए. शहर ने नौकरी के मौके दिए. नए तरह का समाज, घर दिए. इतना कुछ देने के बाद बदले में कुछ लेना तो बनता ही था. शहर ने सेहत, उम्र मांग ली.
मुझे लगता है कि हमारा कमजोर होता शरीर, मन, एक तरह का टैक्स है, जो हम शहर को उसकी सुविधा के बदले में देते हैं. हमारी बर्दाश्त करने की क्षमता, मिलजुल कर रहने की आदत को शहर निरंतर घटा रहे हैं. हम बात बात पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं. बड़े छोटे की मर्यादा, उसका अंतर हम भूलते जा रहे हैं.


पति-पत्नी के संबंधों में तनाव नई चीज नहीं है. माता-पिता और बच्चों के मतभेद नए नहीं है. उसके स्वरूप बदल गए हैं, लेकिन तनाव हमेशा था. तनाव हमेशा से था. हां, पहले हम तनाव पर ईर्ष्या, अहंकार का लेप इतना नहीं लगाते थे. पहले उसमें अहंकार का चक्रवृद्धि ब्याज नहीं  था.



अब शहर में अपनी जड़ों से कटे मन को एक-दूसरे के अहंकार और ईर्ष्या का भी सामना करना पड़ता है. अकेले मन के लिए यह सब सहना आसान नहीं है. इसीलिए तो मन टूट रहा है. उस पर आत्मीयता और स्नेहन का लेप लगाने वाले नहीं हैं. शहर मनुष्य को एक-दूसरे से जोड़ने में असफल साबित हो रहे हैं. यही उनकी सबसे बड़ी असफलता है.

गांव हमें एक-दूसरे को बर्दाश्त करना ही नहीं सिखाते, बल्कि वह प्रकृति के साथ समन्वय, संबंधों की पाठशाला भी हैं. गांव का जीवन केवल लेने का नहीं है, उसमें गांव को कुछ ना कुछ देने का भाव सहज ही है. प्लास्टिक से पहले वहां कूड़े की कोई समस्या नहीं थी. पानी का संकट, उस विज्ञान के वहां पहुंचने के बाद आया है, जिसने उन्हें अब तक सबसे अधिक कष्ट दिया है. हम मनुष्य धीरे-धीरे 'शॉर्टकट' की ओर बढ़ते जा रहे हैं.
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शहर के जीवन से कम होता रस सबसे अधिक हमारी आत्मा, चेतनता को ही प्रभावित कर रहा है. हमारे साथ निर्दोष भाव से, बिना कामना के कितने लोग खड़े हैं!
कितने ही लोगों के साथ हम यूं ही बिना किसी 'अर्थ' के मिलते हैं. हमने आसपास हमेशा अर्थ खोजने वाली दुनिया रच ली, जिसका सबसे बड़ा नुकसान हम खुद उठा रहे हैं!  तनाव से बचने, जीवन के सुख-दुख सहेजने की दिशा में गांव अभी भी पाठशाला हैं, बस हमें सीखने की इच्छा रखनी होगी.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 22, 2019, 9:09 AM IST
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