#जीवन संवाद : अपने साथ खड़े होना

एक ही आशा प्रबल है. अपने पर विश्‍वास. स्‍वयं के साथ खड़े रहना. उस समय भी जब सारी दुनिया आपमें असफलता खोज रही हो, आपको आशा का दीपक जलाए रखना है.

दयाशंकर मिश्र
Updated: September 13, 2019, 4:02 PM IST
#जीवन संवाद : अपने साथ खड़े होना
असफलता से मुक्‍त होने के लिए स्‍वयं के साथ खड़े होने से अच्‍छा कुछ नहीं. हम भूल रहे हैं, अपना ही साथ देना.
दयाशंकर मिश्र
Updated: September 13, 2019, 4:02 PM IST
आपने यह बात अक्‍सर सुनी होगी. मुसीबत के समय उनके साथ खड़े होना, बुनियादी मनुष्‍यता है, जो हमारे साथ हैं. दूसरों के साथ खड़े होने के चक्‍कर में हम अपने साथ खड़े होना भूल गए हैं. अपने साथ खड़े होने का अर्थ है, अपने निर्णय के प्रति शर्मिंदा नहीं होना. निर्णय केवल निर्णय होते हैं. वह सही/गलत नहीं होते. वह केवल होते है. सौ खराब निर्णय हमेशा अनिर्णय से अच्‍छे होते हैं. निर्णय नहीं करके हम सबसे अधिक अन्‍याय अपने प्रति करते हैं. इसलिए, निर्णय करना हमेशा सही है. हमारा फैसला केवल हमारे ऊपर निर्भर नहीं करता. समय, परिस्थितियां, दूसरों का व्‍यवाहार कुछ ऐसी चीजे़ं हैं, जो हमारे नियत्रंण से परे हैं. उन पर हमारा कोई अधिकार नहीं.



इसीलिए, यहां कहा गया, अपने साथ खड़े होना. हां, हम भूल रहे हैं, अपने साथ खड़े होना. एक फैसला उल्‍टा पड़ते ही हम निंदकों के सामने समर्पण कर देते हैं. अपने आप को कोसने में जुट जाते हैं. इसे बंद कीजिए. अपने साथ खड़े होना जरूरी है.

चंड़ीगढ़ से विकास भाटी लिखते हैं, 'मैंने दो बरस पहले ऑटो सेक्‍टर की अच्‍छी नौकरी छोड़कर अपना रेस्‍तरां शुरू करने का मन बनाया. इसमें जोखिम था लेकिन काम मन का था. लेकिन मेरे जो लोग बिजनेस में साथ आए थे, हौसला हार गए. एक साल के भीतर ही हमें इसे बंद करना पड़ा. सब लोग पीछे पड़ गए. अब क्‍या होगा, क्‍या करोगे. मैंने ऐसी चीजें पढ़नी शुरू कीं, जिनसे हौसला मिलता था. संयोग से एक दिन डियर जिंदगी 'जीवन संवाद' का एक पोस्‍ट पढ़ा. अच्‍छा लगा. अपनी दिशा बदल दी. पहले अपने निर्णय पर शर्मिंदा होता था. अब उसके किस्‍से सुनाने लगा. कुछ दिन पहले अपनी स्‍वयं की पूंजी और पुरानी गलतियों को ठीक करके फि‍र रेस्‍तरां शुरू किया. इस बार पुराने सबक काम आए, हमारा काम बहुत अच्‍छा चल रहा है. आशा है. यह बना रहेगा. मैं अपने निर्णय के साथ सौ प्रतिशत हूं.'

इसे कहते हैं अपने साथ खड़े होना. हमें भी यही करने की जरूरत है. बात चाहे फैसले, रिश्‍तों, करियर किसी भी चीज़ की क्‍यों न हो. उलझे रहने, अनिर्णय से निर्णय हमेशा शुभ होता है. इसमें करने का भाव होता है. कुछ भी करना, न करने से हमेशा अच्‍छा ही होता है.

असफलता से मुक्‍त होने के लिए स्‍वयं के साथ खड़े होने से अच्‍छा कुछ नहीं. हम भूल रहे हैं, अपना ही साथ देना. इससे मन में घुटन बढ़ने लगती है. हम गलतियां खोजते हुए धीमे-धीमे खुद हीन भावना की ओर बढ़ जाते हैं. काश! हमने ऐसा नहीं किया होता. कितना अच्‍छा होता, अगर समय पर दोस्‍तों की बात सुन लेता.


ऐसी चीज़ों का कोई अर्थ नहीं होता. इससे बाहर निकलिए. अब एक ही आशा प्रबल है. अपने पर विश्‍वास. स्‍वयं के साथ खड़े रहना. उस समय भी जब सारी दुनिया आपमें असफलता खोज रही हो, आपको आशा का दीपक जलाए रखना है. आज आप जिनकी भी कहानियां सुनते हैं. उन्‍होंने अपनी यात्रा में जो भी पाया है. ऐसे ही पाया.


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जब कभी जिंदगी में ऐसे लम्‍हे आएं. आप उदास, दुखी होने की ओर जा रहे हों. एक बार ठहकर सोचिए. आप स्‍वयं को किस ओर ले जा रहे हैं. केवल इसलिए क्‍योंक‍ि आपने एक साहसी फैसला लिया, वह असफल रहा, इसलि‍ए! आपने कम से कम फैसला तो लिया. हममें से अधिकतर लोग अपनी पूरी उम्र बिना किसी फैसले के बिता देते हैं. इसलिए. अपने साथ खड़े होना सबसे जरूरी है. तभी आप दूसरों का साथ ईमानदारी से निभा पाएंगे.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 13, 2019, 8:39 AM IST
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