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#जीवनसंवाद: कोरोना और प्यार की कमी!

जीवन संवाद

जीवन संवाद

Jeevan Samvad: कोरोना ने जिस दूसरे संकट को प्रकट किया वह है- प्रेम की कमी. यह मनुष्य के अंदर अस्थिरता, सुरक्षा और बेचैनी पैदा करती है. अपने गांव, शहरों, परिवार से दूर हम सब प्रेम से इतने अधिक रिक्त हो गए हैं कि हमारी उदासी बढ़ती जा रही है.

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अगर मैं आपसे कहूं कि कोरोना संकट के बीच हम सबसे ज्यादा किस चीज़ की कमी से जूझ रहे हैं, तो संभव है जो चीजें सबसे अधिक निकल कर आएं, उनमें वह सब बातें होंगी जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जीवन के आर्थिक पक्ष से जुड़ी हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह संकट थोड़ी देर तक चलने वाला है! संभव है, आरंभ में जितना हमने सोचा, उससे कहीं अधिक. इसलिए यह समझते हुए भी कि आर्थिक जरूरत अपनी जगह है, मैं इस समय भी बड़ा संकट उसे नहीं मान रहा हूं. उसका तो सामना किसी तरह कर ही लिया जाएगा.

किसी भी संकट का सामना असल में हम आर्थिक ताकत के आधार पर नहीं करते, संकट का सामना हमेशा प्रेम की शक्ति से किया जाता है. जीवन में मुझे गरीबी को नज़दीक से देखने का अवसर मिला.

बाद के बरसों में कुछ फैलोशिप अध्ययन के दौरान उन लोगों को जानने समझने का मौका मिला, जो भयंकर गरीबी के बीच भी खुश और संतुष्ट थे. दूसरी ओर सब प्रकार के साधन संपन्न ऐसे समाज को भी जानने का अवसर मिला जिनके पास आर्थिक संकट नहीं थे. लेकिन दूसरे जो संकट थे, वह कहीं गहरे थे! वहां प्रेम की नदी सूखती जा रही है. अगर जिंदगी में कहीं रुकना तय नहीं तो यकीन मानिए महत्वाकांक्षा धमनियों से स्नेह और प्रे म को मिटा देगी.

वृक्ष शाखाओं से बड़े नहीं होते, उनको सारी शक्ति जड़ से मिलती है! जिंदगी में सरपट दौड़ते हम प्रेम की कमी का शिकार हो रहे हैं.‌ साथ छूट रहा है. उदासी, जीवन का अस्थाई भाव है, जो धीरे-धीरे स्थाई हो‌ रही है. संकरी प्रेम गली सांसों में ऑक्सीजन की मात्रा घटा रही है!


कोरोनावायरस ने हम पर सबसे बड़ा उपकार यह किया है कि उसने दो चीज़ों का महत्व स्पष्ट रूप से बता दिया. पहला, प्रकृति और मनुष्य दोनों एक ही हैं. दोनों संयुक्त हैं. बरसों से किताबों में पढ़ते आए हैं, बार-बार हमें याद भी दिलाया जाता है, मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पा ली है! यह हमें मिली सबसे खराब शिक्षा में से एक है. हमारे शरीर के अंग आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते. अगर वह ऐसा करते हैं तो शरीर पर संकट खड़ा हो जाएगा.

मनुष्य और प्रकृति दोनों संयुक्त है. धरती के होने में दोनों की भूमिका गहराई से जुड़ी हैं. हमने प्रकृति को अलग-थलग कर दिया. उसे कमजोर मान लिया. तो प्रकृति ने हमें हमारी स्थिति स्पष्ट रूप से बता दी. प्रकृति बहुत दयालु है वह मनुष्य जैसे क्रूर नहीं.

मुस्कुराते हुए पौधों को देखिए. नीला आसमान और साफ नदियां, जंगल, पशु- पक्षी क्या कहते हैं! काश, हम पशुओं की भाषा जानते. पक्षियों की बोली समझते. लेकिन ऐसा भी बहुत कुछ है जो बिना भाषा जाने समझा जा सकता है. मनुष्य के विजय अभियान पर रोक लगते ही प्रकृति मुस्कुरा उठी है. ‌बरसों से हम उसके संकेत नहीं समझ रहे थे. इस संकट ने मनुष्य की महत्वाकांक्षा की क्रूरता और कठोरता को उजागर किया है.

‌जिसमें प्रेम की कमी होगी, वह किसी एक के प्रति कठोर नहीं होगा. वह सब के प्रति ही कठोर होगा. नारियल, हमारे हाथ देखकर अपनी कोमलता तय नहीं करते. वह जैसे रहते हैं वैसे ही हमेशा रहते हैं. कोरोना ने जिस दूसरे संकट को प्रकट किया वह है- प्रेम की कमी. यह मनुष्य के अंदर अस्थिरता, सुरक्षा और बेचैनी पैदा करती है. अपने गांव शहरों, परिवार से दूर हम सब प्रेम से इतने अधिक रिक्त हो गए हैं कि हमारी उदासी बढ़ती जा रही है.

जिस तरह शरीर में विटामिन डी की कमी (डिफिशिएंसी) शरीर को कमजोर बनाती है. हड्डियों में दर्द पैदा करती है. असहनीय पीड़ा का कारण बनती है. ठीक उसी तरह प्रेम की कमी हमें रूखा और अकेला बनाती है. अकेलेपन की ओर धकेलती है!


हमें कोरोना का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने हमें प्रकृति और प्रेम दोनों के बारे में सजग किया है. अपनों से उनके जिंदा और खुश रहते प्रेम कीजिए. सुशांत सिंह की मौत से यह मत समझिए कि संकट बहुत दूर है! जीवन संवाद में हम इस बात को बार-बार कहते रहे हैं कि आत्महत्या संक्रामक है. कमजोर मन को वह वैसे ही पकड़ती है जैसे कमजोर शरीर को बीमारी.

अपनों को भरपूर प्रेम दीजिए. उनकी फिक्र कीजिए. सोशल मीडिया से सुरक्षित दूरी रखिए. प्रेम में हर संकट से बचने की शक्ति है , बस इसे महसूस कीजिए, अपनों को कराइए!

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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