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#जीवनसंवाद : खजाना कहां है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 18, 2019, 10:03 AM IST
#जीवनसंवाद : खजाना कहां है!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हम कहां देख पाते हैं, भीतर की ओर. बाहर का शोर इतना ज्‍यादा है कि हम अंतर्मन की शांत, गहरी आवाज अक्‍सर नहीं सुन पाते.

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  • Last Updated: December 18, 2019, 10:03 AM IST
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कस्बे के पुराने पीपल के पास कोने में बैठकर एक भिखारी भीख मांगते थे. कई बरस बीते. वह वहीं बैठकर भीख मांगने के कारण पहचाने जाने लगे. जिस तरह हम एक ही काम करने के कारण पहचाने जाने लगते हैं, वैसे ही उनकी पहचान होती गई. मांगने की आदत जितनी बढ़ती जाती है, हम उतने ही बड़े भिखारी बनते जाते हैं. इससे अंतर नहीं पड़ता कि आप किससे मांगते हैं, असल बात तो यही है कि आप मांगते रहते हैं. जो निरंतर मांगता रहता है, वह भिखारी ही तो हुआ.

एक दिन भिखारी की मौत हो गई. पच्चीस बरस तक भीख मांगने के कारण वह लोकप्रिय हो गए थे. जब उनने शुरू किया तो वह छोटे भिखारी थे, धीरे-धीरे बड़े बनते गए. उनके नहीं रहने के बाद आसपास के लोग उस जगह की साफ-सफाई के लिए जुटे. जगह को साफ करने के दौरान वहां थोड़ी खुदाई की जरूरत पड़ी. जगह को समतल किया जा रहा था कि किसी बुजुर्ग को एहसास हुआ कि यहां कुछ है. उस जगह को गहरा किया गया, तो वहां एक पीतल के बर्तन में खजाना मिला. जिसकी कीमत का सहज अंदाजा लगाना संभव नहीं था.

सब चकित थे कि कैसे इतने बरस उनकी आंखों के सामने खजाने के ऊपर बैठकर भीख मांगी जाती रही. यह सब चल रहा था तभी एक सूफी संत आए.


उन्होंने कहा, 'अरे इस भिखारी को छोड़ो. वह तो जिंदगीभर नहीं समझ पाया कि खजाने के ऊपर बैठकर भीख मांग रहा है. अपनी सोचो. अपने भीतर देखो. अपने मन की गहराई में जाओ. तुम लोग भी न जाने किस-किस तरह के खजाने दबाए बैठे हो. उस खजाने तक पहुंचो. अपने को जानो. जो तुम कर रहे हो, वह कितना तुम्हारी काबिलियत के अनुसार है. तुम न जाने दुनिया से कौन सी भीख (चाहत/इच्छा) के लिए जिए जा रहे हो, जबकि तुम्हारे भीतर इस भिखारी के बैठने की जगह जैसा खजाना छुपा हुआ है. अपने को जानना हमारे लिए उतना ही कठिन है, जितना इस भिखारी के लिए यह जानना था कि वह अनमोल खजाने के ऊपर बैठकर भीख मांगता है.



यह कहना संभव नहीं कि उस कस्बे के कितने लोग सूफी संत की बात समझ पाए होंगे, लेकिन क्या हम समझ पाए. जिंदगी को. अपने सपनों की चाहत को. उन शक्तियों को जो खजाने की शक्ल में हमारे भीतर बैठी हैं. हम कहां देख पाते हैं, अपने भीतर की ओर. बाहर का शोर इतना अधिक है कि हम अंतर्मन की शांत, गहरी आवाज को अक्सर नहीं सुन पाते.


हम बचपन में कुछ और होना चाहते थे. हमें कुछ और होने के लिए कहा गया. उस तरफ जाने के लिए जहां शोहरत, तरक्की, फायदे की झलक थी. अब जब हम बड़े हो गए हैं, तो बच्चों के साथ वही कर रहे हैं, जो हमारे साथ किया गया. जिंदगी में हम अक्सर बदले ले रहे होते हैं. यह बदले की आग बाहर से नहीं दिखती, क्योंकि यह मन में गहरे बैठी है. अक्सर वही लोग अपने बच्चों के साथ हिंसा करते हैं, जिनके साथ हिंसा की गई हो, क्योंकि उनके मन के तहखाने में हिंसा भेष बदलकर बैठी होती है.हिंसा के मैल को मन से साफ किए बिना सुख भीतर नहीं उतरेगा. बाहर की त्वचा को रंगने से मन शांत, निर्मल और सुखी नहीं होगा. हिंसा इसीलिए बढ़ रही है, क्योंकि कुंठा, डर की गांठ नहीं खुली है.
इन गांठों को खोले बिना हम किसी खजाने तक नहीं पहुंच सकते, इसलिए अपने को जानने की तरफ जितनी जल्दी निकलेंगे, उतना बेहतर होगा. अपने इस खजाने को संभाले बिना हम मनुष्यता के उस स्तर तक नहीं पहुंच सकते, जो समाज के लिए न्यूनतम योग्यता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 17, 2019, 11:47 AM IST
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