#जीवनसंवाद: 'न' की आदत!

हमारा स्वभाव इतना अधिक नाजुक, भावुक और संवेदनशील हो गया है कि हम असहज स्थितियों के लिए जरा भी तैयार नहीं हैं. हम धीरे-धीरे कांच होते जा रहे हैं.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 4:28 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 4:28 PM IST
बहुत पुरानी बात नहीं है जब अभिभावक बहुत शक्ति से अपने बच्चों को किसी चीज के लिए ना कह देते थे. समय के साथ सारी चीजें बदलती हैं, धीरे धीरे यह ना भी, हां की ओर बढ़ गया. अब तो स्थिति यह है कि किसी भी चीज के लिए मना करते वक्त हम सौ बार सोचते हैं! सही चीज के लिए भी, और उसके लिए भी जो हमें ठीक नहीं लग रहा. ‌ ‌‌‌

समाज में ऐसी खबरें तेजी से बढ़ रही हैं, जब ना कहने पर हिंसा से लेकर अप्रिय निर्णय करने में हम जरा भी देरी नहीं कर रहे हैं. हमारा स्वभाव इतना अधिक नाजुक, भावुक और संवेदनशील हो गया है कि हम असहज स्थितियों के लिए जरा भी तैयार नहीं हैं. हम धीरे-धीरे कांच होते जा रहे हैं. थोड़ी सी भी चोट लगी नहीं कि चकनाचूर हो गए.

बच्चों की बात छोड़िए, बड़ों का हाल इस मामले में और भी बुरा है. मैं अपने एक मित्र की कहानी आपको सुनाता हूं. वह बहुत प्रिय हैं मुझे, बचपन के साथी हैं. लेकिन कुछ चीजें आज तक नहीं बदलीं. वह किसी भी चीज के लिए ना सुनना पसंद नहीं करते हैं. छोटी छोटी चीजों में भी. वह तय कर लेते हैं कि आज यह फिल्म देखेंगे, तो देखेंगे. तय कर लेते हैं कि आज यहांं जाना है तो जाना है. जब तक अकेले थे तब तक कोई समस्या नहीं थी. अब पत्नी और बच्चे हैं, तो भी उनका व्यवहार नहीं बदला. वह जैसे थे, वैसे ही हैं. उनके पास भरपूर धन संपदा है. लेकिन परिवार उनके रवैए से प्रसन्न नहीं है.

Jeevan Samvaad

यह उनके जीवन का एक हिस्सा है. अपने ऑफिस में भी उनकी कहानी इससे बहुत अलग नहीं है. पर जो निर्णय ले लेते हैं, जैसी राय दूसरों के बारे में बना लेते हैं, उससे दूर हटना उनके लिए संभव नहीं होता. यह अलग बात है कि वह आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति हैं. लेकिन इसके साथ ही यह भी ध्यान देने की बात है कि वह जीवन के सच्चे आनंद, प्रेम और स्नेह से बहुत दूर हैं.

अपनी 'न' बर्दाश्त करने की आदत के चलते वह ऐसे लोगों से घिर गए हैं, जो उनकी हर बात मानते हैं. प्रश्न यह नहीं कि वह अपने जीवन में कितने सफल हैं, बल्कि यह होना चाहिए कि वह अपने जीवन में कितने खुश हैं. वह अक्सर छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाते हैं, क्योंकि उनको लगता है कि वह हर किसी को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं. जबकि हमेशा ऐसा करना संभव नहीं होता.

जीवन में सबकुछ हमारे नियंत्रण में नहीं. हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा है जो नियंत्रण से बाहर है. सबकुछ अगर हमारे बस में हो जाए, तो वह कैसा जीवन है! अगर आप मुझसे पूछें किसी जीवन का पर्यायवाची क्या है तो मैं कहूंगा कि संघर्ष. संघर्ष में बहुत सारा न/ नहीं/ असंभव शामिल है.
Loading...

समाज के रूप में हमारी सोच, व्यवहार सामंती है. अभी भी. हर चीज को आजादी मिलने से जोड़कर मत देखिए. हमारा समाज इतना अधिक विविधता और विषमतापूर्ण है कि उसमें बराबरी जैसी चीज ही बहुत देर से शामिल हो पाएगी. हम स्त्री-पुरुष संबंध जैसी बुनियादी चीज़ में मीलों पीछे हैं. इससे भी मजेदार बात यह है कि अधिकांश पुरुषों को इसका ज़रा भी अंदाजा नहीं है. इसलिए, उनके व्यवहार में अपनी बात पर अड़े रहना और न सुनने की आदत आसानी से आ जाती है. इसलिए, पहला कदम तो यह होना चाहिए कि हम असहमति के लिए अपने मन के दरवाजे खोलें. उसके बाद बच्चों की ओर अभी से ध्यान दें कि वे न सुनने के लिए तैयार हों.

ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)

Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)

अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54 )

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: July 17, 2019, 7:27 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...