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#जीवनसंवाद: दुख से शर्मिंदा नहीं होना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 5, 2019, 4:11 PM IST
#जीवनसंवाद: दुख से शर्मिंदा नहीं होना!
#जीवनसंवाद: दुख से शर्मिंदा नहीं होना!

Jeevan Samvad: हमें दुख को छुपाने की जरूरत नहीं. इस लुकाछिपी के कारण ही हम नकली प्रसन्‍नता की ओर बढ़ते हैं. दुखी हैं तो दिखिए, रहिए लेकिन उसे नकली प्रसन्‍नता में मत बदलिए.

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  • Last Updated: November 5, 2019, 4:11 PM IST
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हम दुख से दुखी होते हैं, शर्मिंदा होते हैं. दुखी होना सहज है. शर्मिंदा होना अस्‍वाभाविक. अकेलेपन की ओर बढ़ते समाज में हम अब दुख से शर्मिंदगी की ओर बढ़ रहे हैं. छोटे-छोटे दुख बड़े होते जा रहे हैं. मन पर वजन बढ़ाने के साथ वह आत्‍मा पर भी बोझ बढ़ाते जा रहे हैं. हमें दुख को छुपाने की जरूरत नहीं. इस लुकाछिपी के कारण ही हम नकली प्रसन्‍नता की ओर बढ़ते हैं. दुखी हैं तो दिखिए, रहिए लेकिन उसे नकली प्रसन्‍नता में मत बदलिए. उस पर बात करके उसे दूर कीजिए.

दुख को सुख के पर्दे के पीछे रखने से वह गहरा ही होगा. उससे मुक्ति के लिए उसे सामने रखना होगा. दुख से शर्मिंदा नहीं होना है. सुख-दुख रॉकेट साइंस नहीं हैं. जिंदगी का अभिन्‍न हिस्‍सा हैं. गांव में एक बात बड़ी अच्‍छी होती थी, हर चीज़ का समय तय था. सुख है, तो उसमें सुखी होने का. दुख है, तो उसमें दुखी होने का. हमारे लोकजीवन में सामूहिकता का पुट इसलिए जरूरी है, जिससे मिलकर हंसा, रोया जा सके. अकेले-अकेले घुटते रहने का रोग शहरी है. गांव की परंपरा में मिलकर रहने का रिवाज मुझे सबसे खूबसूरत बात लगती है.

चूल्‍हा सबका अपनी अपनी हैसियत के अनुसार ही जलेगा, लेकिन हम एक-दूसरे का इतना ख्‍याल तो रख ही सकते हैं कि आज सबके यहां चूल्‍हा जला! हम जो इस तरह अकेले हुए जा रहे हैं, उसकी बुनियाद में हमारा जड़ों से कटना ही तो है. हम सबने परिवार के रूप में बनाया एक नियम तोड़ा है. हम सबके यहां सुख-दुख में शामिल होते थे. रोने के लिए कंधे थे तो हंसने, उत्‍सव के लिए सबका साथ था. रोने से कोई मना नहीं करता था. दहाड़ें मारकर रोने का चलन हिंदुस्‍तान में पुराना है.



बचपन में यह सब अजीब लगता था, लेकिन आज महसूस करता हूं कि यह जीवन शक्ति देने वाला था. आपने महूसस किया होगा, सिर पर चोट लगने की स्थिति में डॉक्‍टर सबसे पहले देखते हैं कि सिर में कहीं खून का थक्का तो नहीं जम गया, क्योंकि यह दिमाग के लिए बहुत हानिकारक होता है.

हमें भी यही करना है. दुखी होने पर जमकर रो लेना है. यह सोचकर ठहरना नहीं, कि लोग क्‍या कहेंगे. लोग कुछ नहीं कहते. जिनको आपसे मोहब्‍बत है, वह आकर संभाल लेते हैं. कुछ कहते नहीं. इसलिए जब रोने का मन हो, खुद को रोकना नहीं. रो लेना. इससे दुख मन में जमेगा नहीं. जमकर 'काई' नहीं बनेगा. मन तनाव, निराशा की ओर फि‍सलने से बचेगा.

चलते-चलते एक बात और. दुख/संकट से शर्मिंदा नहीं होना. चाहे नौकरी ही चली गई हो. नौकरी चली गई, तो चली गई, इसे बचाने की कोशिश की थी. यह कोशिश पर्याप्‍त थी. उससे अधिक कुछ किया नहीं जा सकता. अपनी ओर से जो किया जा सकता है, करिए. बाकी उस पर छोड़ दीजिए, जिस पर आपको भरोसा है.
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मन को शर्मिंदा होने से बचाइए. गलती को स्‍वीकार कीजिए. आगे बढ़ जाइए. अटके मत रहिए. भारतीय दर्शन में प्रायश्‍चित कमाल की चीज है. अगर माफी नहीं मिल रही, तो खुद को प्रायश्‍चित से मुक्त किया जा सकता है. सारांश में मन में दुख जमने नहीं देना है.


अगर सामने वाला निरंतर संवाद के बाद भी आपकी बात सुनने को तैयार नहीं, तो स्‍वयं को उससे मुक्त कर लीजिए. उसके दुख की आग में अपने मन को जलाते मत रहिए.

पराली जैसा जहरीला धुंआ मन की आग से भी उठता है. पर्यावरण के साथ मन का भी ख्‍याल रखिए. दुख में अपनों को शामिल कीजिए. उससे बाहर आइए. शर्मिंदा, दुखी होकर बैठे रहने से जीवन आगे नहीं बढ़ता. वह उन्‍हें ही दुखी करता रहता है, जिनसे आप प्रेम करते हैं. जो आपसे प्रेम करते हैं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 5, 2019, 12:53 PM IST
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