#जीवन संवाद: स्नेह की चादर!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 4, 2019, 3:04 PM IST
#जीवन संवाद: स्नेह की चादर!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad (जीवन संवाद) हर चीज के लिए तर्क गढ़ने की आदत हमें बाजार ने इतनी अधिक सिखा दी है कि हमारे अवचेतन में लाभ, अपने हित के अतिरिक्त कोई दूसरा विचार आता ही नहीं.

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  • Last Updated: September 4, 2019, 3:04 PM IST
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हमको एक-दूसरे से जोड़ने वाला सूत्र प्रेम इस समय गहरे संकट में है. एक-दूसरे के प्रति गहरे अविश्वास, अपने प्रति आत्ममुग्धता, इस सेल्फी समय में प्रेम, आत्मीयता और स्नेह के लिए सबसे अधिक बाधा खड़ी कर रहे हैं. हम एक-दूसरे से इतने अधिक जुड़े हुए हैं कि अगर किसी एक के जीवन में प्रेम की थोड़ी-सी भी कमी होती है, तो दूसरे का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. हम सब एक दूसरे से जुड़ी हुई प्रकृति चक्र की कड़ियां हैं. हमारा मन निरंतर छोटा होता जा रहा है. संयुक्त परिवार अब किताबों में पढ़ाई जा रही वह परंपरा है, जो विलुप्त होने की कगार पर है.

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हर चीज के लिए तर्क गढ़ने की आदत हमें बाजार ने इतनी अधिक सिखा दी है कि हमारे अवचेतन में लाभ, अपने हित के अतिरिक्त कोई दूसरा विचार आता ही नहीं. हम स्नेह की चादर हर दिन छोटी, मैली करते जा रहे हैं. इसका दायरा इतना छोटा हो चला है कि इसमें अब अपने अतिरिक्त किसी के लिए जगह मुश्किल है!

मध्य प्रदेश रीवा से एक अनुभव अन्नपूर्णा त्रिपाठी ने भेजा है. वह लिखती हैं, 'उनके पड़ोस में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे. उनके दो बेटे हैं. लगभग दस वर्ष से दोनों बेटे बेंगलुरु में रहते हैं. अपने माता-पिता के बार-बार आग्रह के बाद भी दोनों इतने वर्षों में कभी उनसे मिलने के लिए यहां आने का समय नहीं निकाल सके. तब भी नहीं, जब उनकी मां बेहद गंभीर रूप से बीमार थीं. डॉक्टरों के मना करने के बाद, पिता के निरंतर अनुरोध के बाद भी बच्चे अंततः नहीं आए. एक दिन उनके पिता ने सूचना दी थी तुम्हारी मां नहीं रही.

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किसी तरह छोटा बेटा एक दिन बाद पहुंचा. पिता ने उससे पूछा अकेले आए हो, भाई क्यों नहीं आया. बेटे ने उत्तर दिया उसने कहा है बार-बार छुट्टी नहीं मिलती. मां के नहीं रहने पर तुम चले जाओ, मैं अपनी छुट्टियां पिताजी के लिए बचा लेता हूं. उसका उत्तर सुनकर पिता की आंखों से केवल आंसू निकले. एक शब्द भी बोल ना सके. पत्नी के सभी संस्कार पूरे करने के बाद उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अनाथालय को ट्रस्ट बना कर दे दी. यह भी अनुरोध किया कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो वही लोग उनकी सारी रस्मों का निर्वाह करें, बच्चों को इसकी सूचना ना दी जाए.

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हम स्नेह की चादर हर दिन छोटी, मैली करते जा रहे हैं.

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उनके ऐसा करने के बाद दोनों बेटों ने फोन से संपर्क किया और कहा कि वह अपनी संपत्ति को इस तरह नष्ट ना करें. पिता ने केवल इतना ही कहा कि वह तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुकी है.' दिलचस्प बात यह रही कि जो रिश्तेदार उनके बच्चों को उन तक लाने में असमर्थ रहे वही अब उनको समझाने में जुटे हैं कि संपत्ति पर तो बच्चों का ही अधिकार है.

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धन्यवाद अन्नपूर्णा जी! स्नेह केवल माता-पिता का दायित्व नहीं है. परिवार, मित्र, रिश्तेदार, सहकर्मी और हमसे किसी भी रूप में जुड़े हुए व्यक्ति का पहले दायित्व और फिर अधिकार है. जिन बुजुर्ग का यहां उल्लेख हुआ मैं उनके निर्णय से पूरी तरह सहमत हूं.
अगर बच्चे अपने जीवन का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं. अपने सुख चुनने के लिए आजाद हैं, तो केवल किसी के यहां जन्म लेने से वह उसकी संपत्ति के अधिकारी नहीं हो जाते!


माता-पिता के प्रति अपने दायित्व को सरकार और समाज के भरोसे छोड़ने वाले अपने बच्चों से क्या हासिल करेंगे, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है. हम बबूल के पेड़ लगाकर आम के फल हासिल नहीं कर सकते, मेरा इस बात में बहुत गहरा विश्वास है! आपकी प्रक्रिया की प्रतीक्षा में!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 4, 2019, 11:30 AM IST
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