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#जीवन संवाद : अप्रिय की मदद!

News18Hindi
Updated: September 24, 2019, 5:13 PM IST
#जीवन संवाद : अप्रिय की मदद!
#जीवन संवाद

जीवन में 'प्रिय-अप्रिय' का नियम मनुष्यता के लिए अच्छा नहीं है. यह गणित के लिए अच्छा हो सकता है. व्यापार के लिए अच्छा हो सकता है. लेकिन जहां तक एक अच्छे जीवन का प्रश्न है, वहां यह धारणा हमारे मन को अलग-अलग खुशियों से बांधने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करती.

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थोड़े संकोच से उन्होंने कहा, 'एक व्यक्ति जिनसे आपके संबंध सहज नहीं हैं, उन्हें मदद की जरूरत है. मैं कर रहा हूं, आपको कोई परेशानी तो नहीं है.' हम ऐसे प्रश्नों के लिए कहां तैयार होते हैं. मैंने उनसे कहा, हां मुझे पता है. आपको बताने की जरूरत भी नहीं है. हम सबके संबंध सभी से एक जैसे नहीं हो सकते, इसलिए आप उनकी मदद करिए क्योंकि आपके उनसे संबंध ठीक हैं. जब उनसे यह कहा जा रहा था तो मुझे यह भी पता था कि उनके बीच में कुछ 'खट-पट' हो चुकी है.



यह कहने वाले मित्र का बड़प्पन, जीवन के प्रति उदारता, मनुष्यता में विश्वास है कि वह मदद करते समय केवल यह सोचते हैं कि ऐसा करना ही हम सबका बुनियादी कर्तव्य है.
'डियर जिंदगी: जीवन संवाद' में हम निरंतर इस विषय पर बात कर रहे हैं कि वह कौन सी चीजें हैं जो हमारी चेतना पर हावी होकर हमें मनुष्य के प्राकृतिक गुणों से दूर करती हैं.
अप्रिय होने के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि आप कभी प्रिय रहे हों. हवा धीरे-धीरे चलती है, सुहानी, मन को प्रिय लगती है. हम टहलते हुए सुख महसूस करते हैं.
इसी बीच समय के एक मोड़ पर अलग-अलग कारणों से वही हवा 'आंधी' में बदल जाती है. हवा को लेकर हमारी पूरी दृष्टि ही बदल जाती है. जो हवा कुछ देर पहले तक प्रिय थी, अब उससे बचने के लिए प्रयास किए जाते हैं. रिश्तों का व्याकरण भी ऐसा ही है. रिश्ते जब तक 'हमारी' गति के अनुसार चलते हैं, प्रिय लगते हैं. विभिन्न कारणों से जब वह हमारे मन के अनुसार नहीं चलते, अप्रिय होने लगते हैं.

जीवन में 'प्रिय-अप्रिय' का नियम मनुष्यता के लिए अच्छा नहीं है. यह गणित के लिए अच्छा हो सकता है. व्यापार के लिए अच्छा हो सकता है. लेकिन जहां तक एक अच्छे जीवन का प्रश्न है, वहां यह धारणा हमारे मन को अलग-अलग खुशियों से बांधने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करती.
जब मैं आपसे यह सब साझा कर रहा हूं तो मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि यहां तक पहुंचना सरल नहीं है. जीवन के प्रति आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को रचे बिना यह सब बातें किताबी लग सकती हैं. असत्य भी. लेकिन जैसे ही आप मन से इन चीजों को स्वीकार करते जाते हैं, आपका मन बहुत कोमल, उदार और हल्का होने लगता है. जब किसी के प्रति मेरे मन में कुंठा, कठोरता, दुराग्रह नहीं है तो मेरा मन कहीं अधिक स्वस्थ और हल्का होगा. उसमें जीवन की बाधा, कठिनाई से लड़ने की क्षमता कहीं अधिक होगी.
हमें अपने मन को दूसरे के अनुकूल नहीं बनाना है. हमें उसे सुखी जीवन के लिए अपने अनुकूल बनाना है. मानसिक बीमारियों की सबसे बड़ी जड़ मनुष्य के मन में पड़ने वाली गांठे हैं. धीमे-धीमे यह मन को खोखला करती चली जाती हैं.
आप डॉक्टर के पास जाते हैं ब्लड प्रेशर, हाइपरटेंशन, भारी सर दर्द और तनाव के लिए. डॉक्टर आपसे बात करने की जगह ऐसी दवाइयां लिखता है जिनसे इन चीजों का नियंत्रण संभव हो. वह निदान नहीं करता केवल समस्या को कुछ समय के लिए रोक देता है. क्योंकि आप उसके लिए बार-बार आने वाले मरीज़ हैं. उसके व्यापार का हिस्सा हैं.

इन सभी चीजों की जड़ हमारा मन है. बात पुरानी है. यह किस्सा हिंदी के सुपरिचित आलोचक , लेखक डॉ. विजय बहादुर सिंह सुनाया था. एक बार उनके दादा जी से किसी ने कहा, मेरे सिर में दर्द हो रहा है. उन्होंने कहा, क्यों? जरूर तुमने कोई अनुशासन तोड़ा होगा! सिरदर्द का अनुशासन से क्या संबंध! दादा जी ने कहा था, प्रकृति ने हर चीज से व्यवहार के नियम कायदे बनाए हैं. धूप, सर्दी, गर्मी सबसे निपटने के तरीके हैं. इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि तुमने मन पर कितना बोझ डाला है. जैसे ज्यादा बोझ उठाने से शरीर पर खराब असर पड़ता है, वैसे ही मन पर अतिरिक्त बोझ डालने से उसका अनुशासनिक टूट जाता है. उसे पीड़ा होती है. इसलिए मन का भी वैसे ही खयाल रखना चाहिए जैसे शरीर का रखा जाता है!
प्रिय-अप्रिय को चली आ रही धारणा के आधार पर मत समझिए, इसे केवल अपने मन की कोमलता, उसकी सुन्दरता, सेहत से जोड़ कर देखिए. यह अभ्यास हमें मानसिक स्वास्थ्य की नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है.
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: September 24, 2019, 8:50 AM IST
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