#जीवनसंवाद: अपनेपन की निरंतरता!

हम साथ रहते हुए अक्सर भूलने लगते हैं कि अपनापन निरंतर जताने की चीज़ है. इसे कभी भी स्थगित नहीं करना चाहिए.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 8:07 AM IST
#जीवनसंवाद: अपनेपन की निरंतरता!
जीवनसंवाद: अपनेपन की निरंतरता!
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 8:07 AM IST
हम साथ रहते हुए अक्सर भूलने लगते हैं कि अपनापन निरंतर जताने की चीज़ है. इसे कभी भी स्थगित नहीं करना चाहिए. 'डियर जिंदगी' जीवन संवाद में हम इस बात पर सबसे अधिक जोर दे रहे हैं कि रिश्तों में प्रेम की मात्रा, स्नेह को लेकर सजग रहने की जरूरत है. मान लेने भर से कुछ नहीं होता. जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, वैसे ही बूंद-बूंद के रिसाव से रिक्त भी हो जाता है.

लखनऊ से भावुक ई-मेल मिला. इसमें इस बात का जिक्र है कि कैसे ‌हम साथ रहने को भी सब कुछ मान लेते हैं. दिनेश और सरोज वर्मा ने लिखा है कि वह मध्य प्रदेश के सागर जिले के रहने वाले हैं. दोनों कामकाजी हैं, दोनों की नौकरी लखनऊ में है. दोनों की शादी पसंद से हुई. दोनों परिवार से दूर हैं. शादी के तीन साल बाद ही दोनों की एक दूसरे से शिकायत बनी रही कि 'वह पहले जैसे नहीं रहे.'

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किसी का भी पहले जैसा होना असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल है. हमारे समाज में दिमाग की बनावट कुछ ऐसी है कि यहां प्रेम का आरंभ ही, शादी की अपेक्षा से होता है. जबकि प्रेम में आप एक दूसरे की असहमति को निरंतर नजरअंदाज करते हैं, केवल एक-दूसरे को खुश रखने का प्रयास करते हैं. इस बात से आप असहमत हो सकते हैं, संभव है कि नाराज भी हों. लेकिन सच यही है.

हमारे दिमाग को कुछ इस तरह 'प्रशिक्षित' किया गया है कि हम समय के साथ अपनी अपेक्षाओं का बोझ रिश्तों पर दोगुना करते जाते हैं.


दिनेश और सरोज के साथ भी यही हुआ. रिश्ते समय के साथ परिपक्व होने चाहिए. उन्हें एक-दूसरे के प्रति समझ, चेहरा होने की सहज संभावना होनी चाहिए. लेकिन रिश्तों की शुरुआत हम इतनी भावुकता से करते हैं कि उनमें अक्सर तर्क और समझदारी की जगह खत्म होती जाती है.

विवाह के बाद धीरे-धीरे कैसे एक-दूसरे से बहुत प्रेम करने वाले दो लोग कर्जदार और जमींदार की तरह व्यवहार करने लगते हैं. जो पक्ष स्वयं को मजबूत समझता है, उसका व्यवहार जमींदार की तरह. और जो स्वयं को थोड़ा कमजोर लेकिन 'सही' समझता है, वह 'कर्जदार' की तरह बातें करने लगता है. जैसे कर्जदार ऋण कब चुकाएगा, इसके अलावा दुनिया भर की बातें करता है. तो दूसरी ओर जमींदार को केवल अपनी 'रकम' से सरोकार होता है, उसे आपके सुविधा में कोई दिलचस्पी नहीं होती. जबकि कर्ज देते समय दोनों का व्यवहार बहुत अधिक शालीन, सम्मान से भरा होता है.
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अब इसकी तुलना ठीक रिश्तों के आरंभ से करके देखिए. कितने प्रेम, अनुराग, स्नेह, आत्मीयता के साथ एक दूसरे को समझने वाले होते हैं, शुरुआत में हम! लेकिन जैसे-जैसे रिश्तों पर जिम्मेदारी, आर्थिक रूप से निर्भरता बढ़ती जाती है.

हम दबाव के सामने बिखरने लगते हैं. हम अपनी बुनियाद को ही अनदेखा करने लगते हैं. इस बात को हमें गहराई से समझना होगा कि रिश्तों में अपनेपन की निरंतरता का वही महत्व है, जो हमारे लिए ऑक्सीजन का.


ऑक्सीजन की आपूर्ति सतत होनी जरूरी है. उसमें रुकावट हो सकता है कि तुरंत जीवन पर प्रभाव ना डाले, लेकिन अगर वह निरंतर नहीं है तो संकट तो हमेशा बना ही रहेगा. इसलिए, आप जिन्हें भी प्रेम करते हैं उनके लिए मतभेद, असहमति, अनबन को कभी भी बाधा न बनने दें. रिश्तों में स्नेह के निवेश निरंतर बनाए रखें, अपनेपन की निरंतरता से जीवन की किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होंगे.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: July 29, 2019, 8:04 AM IST
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