#जीवन संवाद: दिल की भाषा!

यह दिल की भाषा कैसे सीखी जाती है! इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं. कमाल की बात है कि कंप्यूटर तक हमारे इशारे समझने लगे हैं, लेकिन हम एक दूसरे की भाषा पढ़ने में निरंतर परेशानी महसूस कर रहे हैं!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 5:10 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 5:10 PM IST
आप कितनी भाषाएं जानते हैं! आजकल यह सवाल बहुत आम है. हम ज्यादा से ज्यादा भाषाएं सीखने पर जोर दे रहे हैं. अधिक भाषा जानने का यह लाभ भी है कि आप अधिकतम नए विचारों और लोगों तक पहुंच सकते हैं. इस हिसाब से देखा जाए तो समाज में अब तक संवाद हीनता जैसी स्थिति नहीं होनी चाहिए थी. पहले की तुलना में देश में अब अधिक लोग अंग्रेजी बोल, समझ रहे हैं. हिंदी, अंग्रेजी दोनों जानने, समझने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है.

इसके बाद भी हम विश्वासपूर्वक नहीं कह सकते कि हमारा संवाद पूर्णता की ओर बढ़ रहा है. हम एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं. अगर भाषा इकलौता माध्यम होती तो संभव है कि हम सरलता से यह कर पाते. लेकिन ऐसा नहीं है. भाषाएं तो हम कई सीख रहे हैं. लेकिन हमारी भाषाएं मन के बाहर-बाहर तैर रही हैं. हम एक दूसरे को समझने के लिए भाषा के बेहतर उपयोग से अभी भी दूर हैं.

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सूफी संत रूमी कहते हैं, 'इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितनी भाषाएं जानते हैं, बल्कि दिल की भाषा जानना ही आपको अमूल्य बनाता है!'


यह दिल की भाषा कैसे सीखी जाती है! इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं. कमाल की बात है कि कंप्यूटर तक हमारे इशारे समझने लगे हैं, लेकिन हम एक दूसरे की भाषा पढ़ने में निरंतर परेशानी महसूस कर रहे हैं!

लखनऊ से सुजाता वर्मा लिखती हैं, 'बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया, हिंदी, अंग्रेजी, रशियन, फ्रेंच सिखाई. अब जबकि वह बड़े हो गए हैं, ऐसा लगता है, वह स्नेह, दिल/प्रेम की भाषा के अलावा सब कुछ समझते हैं.' सुजाता, उनके पति सोच में डूबे रहते हैं कि उनसे कहां चूक हुई! बच्चे विदेशों में बसे हैं, उनके पास माता-पिता लिए के लिए वक्त को छोड़कर सब कुछ है. पैसे भेजते रहते हैं खूब सारे, जो कि सुजाता को नहीं चाहिए क्योंकि उनके पास पर्याप्त हैं. उन्हें बच्चों का प्रेम चाहिए जिसकी भाषा बच्चे समझ ही नहीं पा रहे.

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बच्चों के पीछे, उनके सपनों के आगे दौड़ते वक्त हमें ध्यान रखना होगा कि हम कहीं उन्हें मनुष्य बनाने, प्रेम की भाषा सिखाने में पीछे तो नहीं छूट रहे. बच्चों का भविष्य बनाते-बनाते हम उनका वर्तमान निरंतर शुष्क, प्रेम रहित और एकाकी बनाते जा रहे हैं. सफलता की ओर हमारा ध्यान इतना है कि हम उन्हें मनुष्य होने के बुनियादी कायदे भी नहीं सिखा पा रहे हैं. बच्चे जब तक छोटे रहते हैं, हम स्वयं को भूलकर उनके सपनों में व्यस्त रहते हैं और जैसे ही वह बड़े होते हैं वह हमें भूल कर अपने सपनों में व्यस्त हो जाते हैं.


मनुष्य और मनुष्यता के लिए केवल विचार करने से काम नहीं होता, उसे अपने आचरण में भी ढालना होता है. कल हम अपने एक पड़ोसी के घर किसी काम से गए, उन्होंने कहा आज नहीं कल बैठते हैं. आज हमारे घर में मेहमान आए हैं. कौन हैं, पत्नी ने पूछ ही लिया. मां आई हैं! कहकर उनने दरवाजा बंद कर लिया! और हम सोचते रह गए कि मेहमानों की सूची में मां कब शामिल हुईं!
पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 6, 2019, 7:45 AM IST
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