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#जीवन संवाद: प्रेम की अभिव्यक्ति!

#जीवन संवाद: प्रेम की अभिव्यक्ति!

दवाइयां हम एक जैसी खाते हैं, लेकिन मां के पास रहने पर क्यों जल्दी ठीक हो जाते हैं. एक-दूसरे के स्पर्श में जो शक्ति है, वह दूसरी किसी भी चीज़ में नहीं.

संभव है कि शीर्षक पढ़कर आप संवाद के बारे में कोई विशेष राय बना लें. इसलिए, पहले ही स्पष्ट करना जरूरी है कि यह 'उस' प्रेम के बारे में नहीं है, जिसका हम बहुत अधिक सरलीकरण कर बैठे हैं. बल्कि उस गहरे भाव के बारे में है, जो हमारे हृदय की गहराइयों में इतना डूबा हुआ है कि पहुंच से बाहर हो गया. प्रेम अनिवार्य रंग है. इसके बिना जीवन का इंद्रधनुष अधूरा है. इसे अपने भीतर रख हम भूल गए हैं! ठीक वैसे, जैसे जरूरी कागज बहुत संभाल कर रखने के बाद खोजने पर भी नहीं मिलते!

#जीवन संवाद : आप घर में क्या हैं!

कुछ दिन पहले ही खुद से बहुत छोटी एक बच्ची को उसके पिता का जन्मदिन याद दिलाया. उसके कुछ दिन बाद उसे एक ऐसी ही दूसरी जानकारी दी. उसने एक बहुत छोटा स्नेहिल संदेश मुझे भेजा. हम लगभग दो दशक से एक दूसरे से परिचित, लेकिन इतनी आत्मीयता उसके संदेश में पहले कभी नहीं थी. ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपने जीवन के सबसे कठिन समय का सामना कर रही है. ऐसे में उसे अच्छा लगा कि कोई है, जिसे उसका खयाल है! मैंने आर्थिक रूप से उसकी कोई सहायता नहीं की, प्रयास भी नहीं किया. लेकिन उसके बाद उसके भी उसके संदेश ने मुझे प्रेम की ऊर्जा से सराबोर कर दिया.

#जीवनसंवाद: अपनेपन की निरंतरता!

हमारे आस-पास बहुत कुछ ऐसा है, जो बस खयाल रखने से महकने लगता है. हम एक-दूसरे की हर तरह से मदद कर रहे हैं, लेकिन सबसे जरूरी चीज़ छूट रही है. एक दूसरे का साथ! जबकि इसके जैसी शक्ति किसी दूसरी चीज में नहीं है. दवाइयां हम एक जैसी खाते हैं, लेकिन मां के पास रहने पर क्यों जल्दी ठीक हो जाते हैं. एक-दूसरे के स्पर्श में जो शक्ति है, वह दूसरी किसी भी चीज़ में नहीं. हम मैसेंजर और चैटिंग में इतने उलझ गए हैं कि प्रेम की अभिव्यक्ति दूर की कौड़ी होती जा रही है. किसी के पास 'दूसरे' के लिए समय नहीं है. यहां हर कोई दूसरा है, अपने सिवा. अपनी बनाई किसी स्मार्ट गली में हम भटक गए!

#जीवन संवाद : पुराने, गहरे दुख!

यह मत सोचिए कि तकनीक ने हमें क्या दिया, इस पर भी गौर कीजिए कि उसने क्या छीना! कभी आंख बंद करके, जगजीत सिंह की 'कागज की कश्ती' के सहारे उस दुनिया में भी टहलिए, जहां एक-दूसरे का साथ ही सब कुछ था! एक-दूसरे के साथ होने का एहसास सबसे अधिक उस विज्ञान ने कम किया है जिस पर हमने दूरी मिटाने की जिम्मेदारी डाली थी.


चलते-चलते हम सबके प्रिय अल्बर्ट आइंस्टाइन के गहरे प्रेम किस्सा सुनते चलिए. उनके वैज्ञानिक प्रसंग आपने खूब सुने होंगे. 1936 में जब आइंस्टाइन की पत्नी नहीं रही तो उनकी बहन माजा महान वैज्ञानिक की मदद के लिए उनके साथ रहने लगीं. माजा 1950 में किसी बीमारी के चलते कोमा में चली गईं. उसके बाद अति व्यस्त आइंस्टाइन हर दोपहर दो घंटे उनके साथ गुजारते. उन्हें प्लेटो की किताब के अंश पढ़कर सुनाते.

#जीवनसंवाद: 'न' की आदत!

हालांकि, माजा की ओर से कोई संकेत नहीं मिल रहे थे कि वह समझ रही हैं या नहीं, फिर भी आइंस्टाइन का मानना था कि उनके मस्तिष्क का एक हिस्सा जीवित है. इसके साथ ही आइंस्टाइन मानते थे कि किसी का ध्यान रखने वाला काम करने से भी प्रेम अभिव्यक्त होता है!

प्रेम, केवल शब्दों के सहारे यात्रा नहीं कर सकता. ध्यान, साथ और समय का सानिध्य उसके लिए अनिवार्य है. सच्चा प्रेम वही है, जिसे शब्दों के तरीके दूसरे किसी माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सके.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

Tags: Dayashankar mishra, JEEVAN SAMVAD, Life Talk, Motivational Story

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