#जीवन संवाद : भूलने का सुख!

हम मन पर लगे घाव, स्मृतियों के धब्बे, चोट के निशान के बारे में इतने लापरवाह क्यों हैं! अक्सर हमारी स्मृति अतीत के जालों में अटकी रहती है.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 10, 2019, 8:48 AM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 10, 2019, 8:48 AM IST
बच्चों और बड़ों में क्या फर्क होता है. इसके अनेक उत्तर हैं. लेकिन जीवन की दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतर भूलने के सुख का है. केवल बच्चों के पास सुविधा है कि वह आज की परेशानी, अनबन, दुख को अगली सुबह तक स्मृति से बाहर कर सकते हैं. उम्र बढ़ने के साथ ही 'भूलने की कला' हम भूलते जाते हैं. किसी भी चीज़ का जरूरत से अधिक संग्रह मेरे लिए परेशानी का कारण बनता है. भूलने की योग्यता खत्म होते जाने के कारण दिमाग़ में ऐसी चीजों का जमावड़ा होने लगता है जो हमारी ऊर्जा, कोमलता और आत्मीयता की नमी को सोखते जाते हैं.

हमारी गाड़ी में अगर कोई खरोंच मार कर चला जाता है, तो हम क्या करते हैं! उसे मैकेनिक के पास ले जाते हैं, उस दिन ठीक होकर वो गैराज से हमारे घर आ जाती है. संभव है अगले कुछ दिनों में हमें याद भी नहीं रहे की गाड़ी के साथ क्या हुआ था. मैकेनिक से बार-बार कहते हैं कि इसे ऐसे ठीक करना कि चोट का कोई निशान न रहे.

कितनी चिंता होती है हमें गाड़ी की! हम उसे एकदम चकमक रखना चाहते हैं. लेकिन हम मन पर लगे घाव, स्मृतियों के धब्बे, चोट के निशान के बारे में इतने लापरवाह क्यों हैं! अक्सर हमारी स्मृति अतीत के जालों में अटकी रहती है. पुरानी चीजों से चिपके रहने से कोई लाभ नहीं बल्कि वह अपने अवचेतन मन पर बोझ बढ़ाने जैसा काम है. निरंतर!

कुछ दिन पहले की बात है. पुराने मित्र मिलने आए. किसी व्यक्ति का जिक्र आते ही अचानक उनके चेहरे पर गहरा तनाव उभर आया. धड़कन तेज होने लगी, आवेश में आते हुए उन्होंने कहा, 'उनका तो नाम भी मत लीजिए. क्या नहीं किया था मैंने उसके लिए, बदले में उसने क्या दिया! हमारे साथ उन्होंने जो किया है, इसके लिए उन्हें कभी क्षमा नहीं किया जा सकता!'

पानी का ग्लास देते हुए मैंने उनसे कहा, 'उसे तो क्षमा नहीं किया जा सकता, लेकिन खुद को कब तक माफ नहीं कीजिएगा.'


कुछ देर वह मौन रहे. फिर शून्य में देखते हुए बोले, मैं उसकी स्मृतियों के खंडहर से वापस नहीं आ पा रहा हूं. मैं क्या करूं वह मेरा बहुत ही आत्मीय, जिगरी रहा है. मैंने उनकी बात में जोड़ा, बिगाड़ होने के लिए कभी न कभी मित्र होना बुनियादी शर्त है. मन के तार एक बार उलझ जाएं तो इतनी आसानी से कहां सुलझते हैं. इसलिए जरूरी है कि दूसराें सेे हुई अनबन, तनाव, अलगाव से आगे बढ़कर जीवन की ऊर्जा को नई कोपल में लगाया जाए. जिससे मन में नई हरियाली का संचार हो सके, जीवन के जंगल में खूबसूरती बढ़े, इसके लिए नए पौधे बहुत जरूरी हैं. हमें जंगल से सीखना है कि वह अपने उद्दंड वृक्षों से कैसे निपटता है! दूसरों के साथ रहते हुए भी उनके साथ कैसे नहीं रहना, यह कला जंगल से बेहतर कोई नहीं सिखा सकता. अगर इसे समझने में मुश्किल आ रही हो तो कुछ दिन प्रकृति की गोद में रहकर आइए, बहुत सी उलझनें दूर हो जाएंगी.

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पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 10, 2019, 8:00 AM IST
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