#जीवनसंवाद: संयुक्त सुख!

हमारे अंदर सुख की कोई गहरी लहर तभी उठती है, जब उसका कोई सिरा सीधे हमसे जुड़ा हो. संयुक्त सुख की सबसे बड़ी बाधा यही है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:24 AM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:24 AM IST
आपने कई तरह के सुख के बारे में सुना होगा. कभी आपने संयुक्त सुख जैसी कोई चीज़ सुनी है! आपने सुना भले न हो, लेकिन इसे महसूस जरूर किया होगा. कोई एक सूचना जिससे बहुत सारे लोग सुखी होते हैं, जबकि उसका हितग्राही कोई एक व्यक्ति ही होता है, यही संयुक्त सुख है. संयुक्त परिवार इसे सबसे अधिक महसूस करने वाली इकाई रही है. इसके बिखरने के साथ सुख का यह स्वरूप धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है. हमारे अंदर सुख की कोई गहरी लहर तभी उठती है, जब उसका कोई सिरा सीधे हमसे जुड़ा हो. संयुक्त सुख की सबसे बड़ी बाधा यही है!

एक-दूसरे की प्रशंसा जैसी साधारण चीजों से हम दूर होते जा रहे हैं. इसके उलट हमें दूसरों में दोष गहराई से दिखाई देने लगे हैं. किसी भी व्यक्ति का नाम लीजिए, तो सबसे पहले क्या याद आता है. अगर आप सबसे पहले उसके लिए नकारात्मक बातों को याद करते हैं तो निश्चित रूप से मानिए कि आप सुख से कुछ दूरी पर हैं. किसी व्यक्ति विशेष के मामले में अगर ऐसा होता है, तो फिर भी ठीक है लेकिन अगर आपका स्वभाव ही ऐसा हो गया है, तो चिंता की बात है.

आपका कोई साथी, पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार जब आपसे अपने सुख की कोई बात साझा करते हैं, तो आपकी आंखों में उन्हें जो प्रसन्नता दिखती है, वही 'संयुक्त' सुख है. इसे शब्दों से बता पाना मुश्किल है, लेकिन महसूस करना एकदम आसान. आपकी सफलता से सुखी होने वालों के मनोभाव एकदम सरल हैं. यह उसकी आंखों, चेहरे, आवाज में एकदम साफ साफ उतर आता है.

जितने लोगों के संयुक्त सुख में आप भागीदार होंगे, आपके सुख में भी उतने ही लोगों की हिस्सेदारी बढ़ती जाएगी. दूसरे को रास्ते मिलने पर जिनके भीतर यह भाव रहता है कि इससे उनको भी किनारा मिलने में सरलता होगी, उनके जीवन में आशा का स्थाई भाव हमेशा बना रहता है.

'संयुक्त' सुख की अवधारणा मैंने सबसे अधिक पिता से समझी. वह मेरे जीवन के सबसे बड़े अध्यापक हैं. उन्होंने हमें सिखाया कि कैसे न्यूनतम चीज़ों से जीवन संभव है. किस तरह दूसरों के सुख की छाया में अपने मन को सबसे सुखी रखा जा सकता है. उन्हें मैंने कभी ईर्ष्या की ओर जाते नहीं देखा. मैं अपने संपर्क में आने वाले किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में यह कहने का साहस नहीं कर सकता.

ईर्ष्या मुक्त मन ही संयुक्त सुख की गली तक पहुंचाने में सक्षम है. दूसरों की सफलता से सुख हासिल करना सरल नहीं है. ऐसा करने वाले को 'संत' कहा जा सकता है. संत का एक अर्थ यह भी है कि उस व्यक्ति की इच्छा समाप्त हो गई हो. जो वर्तमान में इतना डूब जाए भविष्य की ओर से मुक्त रहे. वही अपरिग्रह का साधक है.

'संयुक्त' सुख जीवन के प्रति गहरी भावना, आत्मीयता, स्नेह और आस्था से जुड़ा है. 'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया. सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्.' इसी का प्रचलित भाव है.
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First published: July 15, 2019, 11:07 AM IST
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