#जीवन संवाद : आत्महत्या का संक्रामक होना!

छोटी-छोटी बूंदें ही नदी में बाढ़ का कारण बनती हैं, हमेशा बादल फटने से बाढ़ नहीं आती! सुख मन के उन भावों में छुपा है, जिनकी हम निरंतर उपेक्षा करते हैं. यही संकट का आरंभ है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 9:45 AM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 9:45 AM IST
हमारे बीच सबसे तेजी से बढ़ती बीमारी का नाम, जीवन के प्रति गहरी निराशा है. यह निराशा जब मन के तट छोड़कर आत्मा तक पहुंचने लगती है, तो यह धीरे-धीरे जीवन पर भारी पड़ने लगती है. पिछले कुछ समय में हमारे अखबार मशहूर उद्योगपति वीजी सिद्धार्थ, क्रिकेटर वीबी चंद्रशेखर से लेकर देशभर में ऐसी अनेक हस्तियों के जीवन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण का गवाह रहे. आत्महत्या हमारे समाज में पहले कभी-कभी सुनाई देने वाली खबर थी. पिछले दस बरस में जिस तेजी से बढ़ रही है, वह हमारे लिए अनेक खतरों की पूर्व सूचना है.

समाज में उदाहरण 'ऊपर' से नीचे की ओर यात्रा करते हैं. नीचे से 'ऊपर' की ओर नहीं. इसलिए ऐसे व्यक्तियों का जीवन अंत चुनने का निर्णय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जो कहीं ना कहीं हमारे अवचेतन में गहरी छाप छोड़ने वाले हैं. मीडिया और सामाजिक चिंतक अभी भी आत्महत्या के आर्थिक पहलू को बहुत अधिक महत्व दे रहे हैं. जीवन में मन की भूमिका को जब तक हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्व नहीं देंगे, आत्महत्या की गुत्थी मनुष्य पर भारी पड़ती रहेगी!

#जीवनसंवाद: तुम्हारे बिना जीना!
किसी ने क्या हासिल किया है, इससे उसके मानसिक स्तर का बहुत ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता. जैसे पौधे को बाड़ की जरूरत होती है, बड़े वृक्ष को नहीं. लेकिन लकड़ी की कटाई करने वालों से तो वृक्ष को भी खतरा है! ऐसे ही हमारी उम्र कुछ भी हो मन के गहरे तनाव से संकट हमेशा है! दूध को कितनी ही अच्छी तरह क्यों न पकाया जाए, सहेजा जाए, जरा सी खटास उसके मिजाज को बदल देती है. दूध इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता 'फट' जाता है!


संभव है, यह तर्क आपको महत्व का न लगे, फिर भी धैर्य रखें. हमें जीवन के तनाव को बहुत छोटी-छोटी चीजों में उतरकर समझना है. छोटी-छोटी बूंदें ही नदी में बाढ़ का कारण बनती हैं, हमेशा बादल फटने से बाढ़ नहीं आती! जीवन का सुख मन के उन भावों में छुपा है, जिनकी हम निरंतर उपेक्षा करते हैं!
यह बात 'डियर जिंदगी' जीवन संवाद के पाठकों से मिल रही सतत प्रक्रिया, विभिन्न शहरों मेंं होने वाले संवाद के आधार पर कही जा रही है. पिछले एक-डेढ़ दशक में भारत के विभिन्न शहरों में लोगों के साथ मिलने, जीवन के विभिन्न तत्वों पर उनसे चर्चा, निरंतर शोध, अध्ययन के ठोस निष्कर्ष मुझे कहने की अनुमति देते हैं कि
आत्महत्या मन के भीतर बैठी उस गहरी बर्फ की परत की तरह है, जिसकी एक झलक ही बाहर दिखती है! आपको टाइटैनिक याद है ना. विशाल जहाज, इसलिए डूबा, क्योंकि समंदर की कोख में बैठे बर्फ के पहाड़ को वह टीला समझ बैठा. उसके आकार का सही अंदाजा उस समय के सबसे अनुभवी विशेषज्ञ, इंजीनियर, उपलब्ध सबसे उन्नत तकनीकी भी नहीं लगा सकी थी.


#जीवनसंवाद: तुम्हारे बिना जीना!
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यही आज हम तनाव, उदासी, घुटन के साथ कर रहे हैं. मनुष्य, मनुष्यता और जीवन के हित में इसे बदलना होगा. अपने आसपास जहां कहीं भी हमें उदासी की छाया दिखे, उसके प्रति सजग हो जाइए. इससेेेे कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति कौन हैं, क्या करते हैं. तनाव के बीज किसी भी मन की मिट्टी पर उपज सकते हैं. जिस तेजी से यह घटनाएं बढ़ रही हैं, यह उनके संक्रामक होने का संकेत है. इसलिए, अपनों की केवल फिक्र मत कीजिए, उनके साथ उनके गहरे उतरने के लिए प्रेम और स्नेह का भी निवेश कीजिए!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 19, 2019, 7:57 AM IST
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