#जीवन संवाद: रिश्ते में श्रेष्ठता का पेंच!

जिंदगी से जरूरी कुछ भी नहीं है. इसलिए, जब कभी कोई संकट आए तो अपने सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता जीवन को मानिए. उसके लिए किसी भी चीज को दांव पर लगाया जा सकता है. लेकिन किसी भी चीज़ के लिए जीवन को दांव पर लगाना उचित नहीं.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 26, 2019, 3:31 PM IST
#जीवन संवाद: रिश्ते में श्रेष्ठता का पेंच!
जीवन संवाद
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 26, 2019, 3:31 PM IST
पति-पत्नी के बीच तनाव से लेकर परिवार में सबसे अधिक परेशानी जिन विषयों को लेकर सामने आती है, उनमें श्रेष्ठता का भाव सबसे बड़ा है. प्रेम जितना गहरा होता है, संबंधों के बीच एक-दूसरे को श्रेष्ठ साबित करने का भाव उतना ही कम होता है! जहां यह भाव कम होगा वहां प्रेम गहराता जाएगा!

राजस्थान के जयपुर से अनुराधा गोयल ने लिखा है, 'जीवन के कितने बहुमूल्य साल गुजरने के बाद समझ में आया कि पति-पत्नी के रूप में हम कितने अनावश्यक विवाद में शामिल रहते हैं. थोड़ी सी सजगता और सरलता से इसे टाला जा सकता है, लेकिन इस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता.'



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अनुराधा ने 'डियर जिंदगी' जीवन संवाद को 'डिप्रेशन और आत्महत्या 'के विरुद्ध प्रभावी बताने के साथ ही मनुष्यता के लिए कोमल प्रयास बताया है. उनके अनुसार, 'हमारे आस-पास सब कुछ इतनी तेज़ी से घट रहा होता है कि हम उसे अक्सर नजरअंदाज करते हैं. जीवन संवाद उन विषयों को पकड़ने का काम कर रहा है जो हमसे जिंदगी की भागमभाग में छूट जाती हैं.'

आभार अनुराधा जी. इसमें इस विषय पर आप सब की ओर से प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. सभी का आभार. जीवन के संकट इतने गहरे हैं कि उनको बिना ठहरे, खुद को धीमा किए, सुनने-समझने को तैयार किए बिना हल करना संभव नहीं है. इसलिए, हम लगातार बात कर रहे हैं कि भले ही आप किसी भी पेशे में क्यों ना हो, कितने की दबाव में काम क्यों ना करते हों, घर पर अपने आचरण में प्रेम, स्नेह और आत्मीयता की कमी कभी मत होने दीजिए. यह जीवन का सबसे अनमोल तत्व है.

जिंदगी से जरूरी कुछ भी नहीं है. इसलिए, जब कभी कोई संकट आए तो अपने सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता जीवन को मानिए. उसके लिए किसी भी चीज को दांव पर लगाया जा सकता है. लेकिन किसी भी चीज़ के लिए जीवन को दांव पर लगाना उचित नहीं.

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जीवन से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं, स्वयं की श्रेष्ठता का भाव भी नहीं. रिश्तों, विशेषकर पति-पत्नी, माता पिता और बच्चों के बीच सबसे अधिक तनाव श्रेष्ठता के भाव को लेकर ही है. पति-पत्नी में से जिसका स्वभाव थोड़ा भी प्रखर होता है, उसे हमेशा इस बात का भान होता है कि वह श्रेष्ठ है, इसलिए उसके विचार से ही जीवन चलना चाहिए.

माता-पिता को भी अक्सर लगता है कि बच्चों को उनके अनुसार ही जीवन यापन करना चाहिए. जबकि वह स्वयं अपने माता-पिता के दिखाए रास्तों पर नहीं, बल्कि अपनी बनाई पगडंडी पर चलते हुए बड़े हुए.

महाभारत में श्रेष्ठता, अहंकार पर बहुत सुंदर प्रसंग है. इसकी विस्तार से चर्चा फिर कभी. अभी, बस इतना कि सब प्रकार से सुखी, ज्ञानी, दर्शन शास्त्र में निपुण राजा ययाति को जब स्वर्ग से अपने ही यश के बखान के कारण निष्कासित कर दिया गया. तो उन्होंने अष्टक के प्रश्न के उत्तर में स्वर्ग के जो सात द्वार बताए, 'सरलता' उनमें से एक है.

सरल होना जीवन में सबसे कठिन है. ययाति कहते हैं, जो अपने अभिमान में फूले-फूले फिरते और दूसरों के यश को मिटाना चाहते हैं, उन्हें कभी भी सुख की प्राप्ति नहीं होती.


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हमें से हर किसी के भीतर अलग-अलग चीज़ों का अभिमान जंग खाता रहता है. जिन चीजों में जंग लग जाता है, वह अपने साथी अपने आसपास की चीजों को भी प्रभावित करने लगती हैं. ऐसा ही हमारे रिश्तों के साथ होता है. एक-दूसरे से मनुष्य का भिन्न होना संभव है, श्रेष्ठ नहीं. क्योंकि प्रकृति के यहां सब कुछ विविधता भरा है. उसने हम सबको विविध बनाया है, वह तुलना के फेर में नहीं पड़ती. उसे विविधता प्रिय है. इसलिए, बेहतर सुखी जीवन के लिए हमें एक दूसरे के प्रति अधिक सहिष्णु, आत्मीय होने की जरूरत है. इससे ही जीवन सुखमय, स्नेहिल होगा.

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First published: August 26, 2019, 7:49 AM IST
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