#जीवन संवाद : आइए, जीते हैं!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 7, 2019, 3:58 PM IST
#जीवन संवाद : आइए, जीते हैं!
हमने स्वयं में परिवर्तन नहीं किया, इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया भी पिछले चौराहे पर खड़ी हमारा इंतजार कर रही है.

हमने स्वयं में परिवर्तन नहीं किया, इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया भी पिछले चौराहे पर खड़ी हमारा इंतजार कर रही है.

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  • Last Updated: September 7, 2019, 3:58 PM IST
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आप सोचेंगे यह भी क्या बात हुई! जीने के लिए कहा जा रहा है! यह काम तो हम बिना सोचे-विचारे कर ही रहे हैं. इसके लिए सोच-विचार की क्या जरूरत है? यह तो हमें कभी सिखाया ही नहीं गया, हमने कभी इसके बारे में बात भी नहीं की. हम सब कुछ वैसे करते हैं, जैसे हमें बताया जाता रहा है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, दूसरों को देखते हुए वैसा ही जीवन जीने लगते हैं. इस तरह हम एक-दूसरे की नकल करते हुए बड़े होते हैं. जैसे सब पढ़ते हैं, हम भी वैसे ही पढ़ते हैं. जिस तरह दूसरे सोचते हैं, हम भी वैसे ही सोचने लगते हैं. हमारे आसपास जिस तरह निर्णय लिए जाते हैं, हम भी कुछ ही दिन में उसी तरह निर्णय लेने लगते हैं. यह एक धीमी लेकिन ठोस प्रक्रिया है, हमारे निर्माण की.

हमारे बनने की एक विधि है, जैसे अलग-अलग चीजों की होती है. हमारे साथ मजेदार बात है कि हम बन तो दूसरे के अनुसार रहे हैं, लेकिन लगता यही है कि हम खुद को बना रहे हैं.  इसीलिए हमने आज के संवाद का आरंभ उस नजरिए से किया, जिससे हमारा होना तय होता है. समाज को हमेशा ऐसे ही लोग प्रिय लगते हैं, जो बने बनाए तरीकों पर काम  करते रहते  हैं. जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण विकसित नहीं करते. जैसे उन्हें बताया गया, वह वैसे ही व्यवहार करने लगे. वैसे ही बच्चों की परवरिश करने लगे. उन्होंने अपने जीवन में क्या नया जोड़ा, इसका कोई हिसाब  नहीं होता.

मैं छोटे से किस्से से अपनी बात को विस्तार देता हूं. हमारे बचपन के मित्र हैं, समाज, व्यक्तियों, पुस्तकों, देश-विदेश के बारे में उनके एकदम वही विचार हैं, जो उनके पिता के रहे हैं. पिता अब काफी बुजुर्ग हो गए हैं, जीवन के बारे में नया नजरिया उनकी पहुंच से दूर हो गया है. लेकिन मेरे मित्र तो अभी चालीस बरस के भी नहीं हैं. वह उन विचारों को बिना किसी परिवर्तन के अपने बच्चों तक पहुंचा रहे हैं. जब दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि अभी का नया अगले ही समय में पुराना लगने लगता है, ऐसे में उन नजरिए, दृष्टिकोण का क्या कीजिएगा जो कब के विदा हो चुके हैं. हमने स्वयं में परिवर्तन नहीं किया, इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया भी पिछले चौराहे पर खड़ी हमारा इंतजार कर रही है.

हमारे जीवन में रिश्तों की अहम भूमिका है. रिश्ते हमारे दृष्टिकोण के साथ विकसित होते हैं. जैसा हमारा विचार होता है, उसकी संगत के अनुसार रिश्ते आगे बढ़ते हैं. हम अपने माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदार के अतिरिक्त जीवन में सब कुछ चुन सकते हैं. इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं. लेकिन हमेशा याद रखिए जीवन सामान्य नियमों से चलता है, अपवाद से नहीं.

जब हम कहते हैं, आइए, जीना सीखें तो इसका अर्थ यह हुआ कि अपनी बौद्धिक, नैसर्गिक क्षमता, प्रतिभा और दृष्टिकोण के अनुसार जीवन जीना. अपने निर्णय स्वयं लेना. उसमें दूसरों के लिए उतनी, वैसी जगह हो जो हमारे सहिष्णु मन के अनुकूल है. अपने मन में दूसरों के नजरिए को जरूरत से ज्यादा अहमियत देने से कठोरता ही आएगी, लोच नहीं. जीवन की आंधियों में ऐसे वृक्ष उड़ जाते हैं जो हवा के साथ कदमताल नहीं कर पाते. इसलिए जीवन की विकट परिस्थितियों का सामना करने के लिए मनुष्य को अनेक अवसर पर आंधियों में टिके रहने के लिए जरूरी लोच अपने भीतर पैदा करना होता है.

इसलिए, आइए जीवन को अपने अनुसार जीने का अभ्यास कीजिए. इसमें कुछ मुश्किल तो आ सकती है लेकिन यह सफर आपको जीवन में अधिक सुकून, संतोष और संकटों का सामना करने के काबिल बनाएगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 6, 2019, 6:33 PM IST
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