#जीवन संवाद: अदृश्य अकेलापन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 5, 2019, 2:49 PM IST
#जीवन संवाद: अदृश्य अकेलापन!
#जीवन संवाद

अकेलेपन से लड़ने के कुछ उपाय उससे जूझ रहे लोगों ने खोज लिए हैं. लेकिन इसके बाद भी जीवन में निर्मल आनंद के लिए लंबा रास्ता तय करना है. संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़े समाज का यह निर्णायक मोड़ है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 5, 2019, 2:49 PM IST
  • Share this:
वह हमारी कॉलोनी में ही रहते हैं. अमिताभ बच्चन सरीखे लंबे चौड़े और अंदाज़ भी कुछ वैसा ही. चेहरे पर हमेशा उपस्थित मुस्कान. सुबह टहलने के वक्त अक्सर उनसे नजरें मिल जातीं. एक दिन मैंने उनसे कहा, 'आप इतना खुश रहते हैं, बहुत ही अच्छा है.' उन्होंने कहा, 'मेरे पास इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है. मैं और मेरी पत्नी दोनों ही यहां अकेले हैं. बहुत कम लोगों से निकटता बची है. जरूरी है कि मैं खुश रहूं, इसलिए मैंने इसे अपना स्वभाव ही बना लिया है.'

अकेलेपन से लड़ने के कुछ उपाय उससे जूझ रहे लोगों ने खोज लिए हैं, लेकिन इसके बाद भी जीवन में निर्मल आनंद के लिए लंबा रास्ता तय करना है. संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़े समाज का यह निर्णायक मोड़ है. इस समय जो युवा हैं, जिनके बच्चे छोटे हैं, बहुत हद तक वह संयुक्त परिवार को महसूस करने वाली अंतिम पीढ़ी हैं.
यदि आप किसी चीज से गुजरे ही नहीं है तो उसके अनुभव के बारे में केवल आप कयास लगा सकते हैं.




इसलिए, जो माता-पिता संयुक्त परिवार से निकलकर नहीं आए हैं, उनके लिए अपने बच्चों में वैसी आदतों का विकास कर पाना मुश्किल हो रहा है. इस समय बच्चे अपने अलावा किसी को भी दो इंच जगह देने को तैयार नहीं हैं. हम उन्हें साझा करना सिखा रहे हैं. हमने बचपन में सीखा नहीं था, बल्कि यह हमारे जीवन का हिस्सा था.
अकेलापन हमारे बीच अमावस्या के अंधियारे की तरह फैल रहा है. हमें पूर्णिमा के चांद की तरह प्रयास करने हैं, फिर उस पूर्णिमा को ग्रहण से बचाना है!


जो अपने में खुश हैं, वह केवल उस दिये की तरह हैं, जो घर में रोशनी कर रहा है. यह अच्छा है, लेकिन हमें गांव, शहर को उजियारा देने वाले चंद्रमा की तलाश है. हमें अधिक शीतलता, आत्मीयता, प्रेम की दरकार है. जब तक पड़ोसी से हमारे संबंध आत्मीय नहीं होंगे. हम देर रात, दोपहर में उसके घर में दस्तक देने से पहले दस बार सोचेंगे तो बात कैसे बनेगी!

मंदी का खतरा इसलिए भी गहरा हुआ, क्योंकि हमने जरूरतों का विस्तार क्षमता की तुलना में कई गुना कर लिया. परस्पर सहभागिता, निर्भरता को हमने लगभग खलनायक की तरह पेश किया.


एक व्यक्ति जो सब से मिलकर अपनी जरूरत है पूरी कर सकता था, उसने धीरे-धीरे सहभागिता को भुलाकर अहंकार की ओर यात्रा आरंभ कर दी. बच्चोंं के मन में जब तक बड़ों के लिए प्रेम नहीं लाएंगे, अकेलेपन से लड़ना हमारे लिए सरल, सहज नहीं होगा. हमें समस्या को सही जगह से समझना चाहिए. जब तक बच्चे प्रेम नहीं सीखेंगे, हमारे बीच अकेलापन सबसेे बड़ा खतरा बना रहेगा. अदृश्य, अकेलापन! इसे केवल आपके साथ मिलकर हराना संभव है.
Loading...

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें- #जीवनसंवाद : दुख सहने की कला!

#जीवनसंवाद : खुद तक वापसी का रास्ता!

#जीवनसंवाद : जो साथ नहीं हैं! 

#जीवन संवाद: दुख संभालने की कला!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 5, 2019, 8:23 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...