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#जीवनसंवाद: अपने को 'बचाए' रखना!

#जीवनसंवाद: अपने को 'बचाए' रखना!

जीवन संवाद

जीवन संवाद

चांद अपने घर में रोशनदान रखता है, जिससे उसे ताजी हवा मिलती रहे, लेकिन ऐसे 'दरवाजे' नहीं बनाता, जिससे गर्म हवाएं आकर उसे बदल दें, जिन्हें उसकी शीतलता पसंद नहीं.

    अपने को बचाए रखना सरल नहीं. हम सब अपने अनुभव का ही परिणाम हैं. बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, थोड़े-थोड़े से सागर वैसे न जाने कितने परिचित, अपरिचित अनुभवों से निर्मित होते हैं. असंख्य तारों के बीच चांद अकेला ही होता है, वह तारों से घिरा जरूर होता है लेकिन उनके व्यवहार से विचलित नहीं होता. अपनी शीतलता, मिठास पर उसे ठोस विश्वास होता है. चांद अपने घर में रोशनदान रखता है, जिससे उसे ताजी हवा मिलती रहे, लेकिन ऐसे 'दरवाजे' नहीं बनाता, जिससे गर्म हवाएं आकर उसे बदल दें, जिन्हें उसकी शीतलता पसंद नहीं.

    पंजाब के जालंधर से मनीष ग्रोवर लिखते हैं, 'एक मित्र से मेरा विवाद हो गया जो मुझे बहुत प्रिय था. इस बात को कोई तीन बरस बीत गए, मेरे दिमाग में उसके साथ बिताई अनेक प्रिय स्मृतियां हैं, लेकिन न जाने क्यों मन उस अपनी घटना पर ही अटका हुआ है, जहां से मन के तार छिटक गए!'

    यह सवाल अकेले मनीष का नहींं है. हम में से अधिकांश लोगों के साथ यही होता है. हम प्रिय स्मृतियों, यादों, अच्छे पलों को किसी एक घटना के इर्द-गिर्द इतना केंद्रित कर देते हैं कि एक अप्रिय घटना सब पर भारी पड़ जाती है. ऐसा करना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन किया जा सकता है. जीवन की धमनियों में छोटी-छोटी बाधाएं कई बार उसकी ऑक्सीजन पूर्ति में बाधा उत्पन्न कर देती हैं.

    इसलिए जब भी ऐसा अवसर आए, स्वयं को अतीत के उस धागे से बांधने की कोशिश करें, जो प्रेम के मजबूत तने से लिपटा हो. कितना कुछ प्रिय है, उनके साथ बिताई यादें हैं जिनसे आज किसी बात पर अनबन हो गई है. एक जरा सी चीज के लिए आज जिनसे हम लड़ बैठे हैं, उनके साथ ना जाने में कितने कष्ट सहे हैं.

    जीवन छोटा भी है और बड़ा भी. छोटा इसलिए, क्योंकि सबकुछ 'प्रीपेड' है. हमारा समय तय है, किसी भी दशा में 'टॉकटाइम' बढ़ाया नहीं जा सकता. बड़ा इस अर्थ में कि हमारे पास समय के गाल पर अपने हस्ताक्षर के लिए पर्याप्त समय है. हम चाहे जो कुछ कर रहे हों, हमारे पास हमेशा यह अवसर हैै कि हम मनुष्य बने रह सकते हैं. इसके लिए बहुत कुछ नहीं करना होता, बस अपने को बचाए रखना है. हम बहुत कुछ हासिल करनेे की होड़ में अक्सर अपना वह स्वभाव भी खो बैठते हैं जिससे हमारी पहचान है/थी.

    दूसरों से कुछ सीखना, उनके जैसा बनने की कोशिश करना वहीं तक ठीक है, जब तक आपके मूल स्वभाव पर उसका असर ना पड़े. हमें यह स्वीकार करनाा चाहिए, जैसे जंगल में ऊंचे देवदार जैसी ही जरूरत कंटीली झाड़ियों, छोटे पौधों की है, वैसे ही हम जो भी हैं, हमारी जरूरत, भूमिका स्पष्ट है. यह बात अलग है कि हम स्वयं को पहचान नहीं पा रहे हैं. इसलिए, जितना संभव हो स्वयं को जानिए, समझिए. सबसे अधिक प्रयास अपनेे भीतर के उस स्वयं को बचाए रखने के लिए कीजिए, जिसे सफलता की होड़ में दुनिया मिटानेे पर आमादा है!

    पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
    Network18
    एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
    सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
    ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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    Tags: Dayashankar mishra, JEEVAN SAMVAD, Life Talk, Motivational Story

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