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#जीवनसंवाद : एक दूसरे को सुनना!

News18Hindi
Updated: October 20, 2019, 9:37 AM IST
#जीवनसंवाद :  एक दूसरे को सुनना!
जीवन संवाद

टेलीविजन हम साथ देखते थे. लैपटॉप ने हमें थोड़ा अकेला किया. लेकिन उसके बाद जब से मोबाइल आया है, हम अकेले होते जा रहे हैं. जब हम सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं, तो संवाद कहां से आएगा.

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  • Last Updated: October 20, 2019, 9:37 AM IST
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रिश्तों में इस समय सबसे अधिक संकट एक-दूसरे को 'न' सुनने को लेकर है. यहां यह समझना जरूरी है कि एक-दूसरे की बात मानने से इसका कोई संबंध नहीं है. एक-दूसरे को न सुनना अलग बात है, एक-दूसरे की बात मानना दूसरी चीज़. हम एक-दूसरे की इच्छाओं की पूर्ति करते हुए यह मान बैठते हैं कि हम एक-दूसरे की बात भी सुन रहे हैं. इससे अनजाने में ही बहुत कुछ अनकहा, अनसुना रह जाता है.

लखनऊ से राधिका त्रिपाठी लिखती हैं, 'मोबाइल से घिरे रहने के बाद घर में हम केवल बहुत जरूरी बातें ही कर रहे हैं. सामान्य, सहज संवाद दुर्लभ हो गया है. असल में हम जरूरतों की बात कर रहे हैं. एक-दूसरे को सुनना, समझना हमारी आदत से बाहर होता जा रहा है. इससे छोटी-छोटी चीजों को लेकर तनाव बढ़ता रहता है. ऐसे में हमें 'जीवन संवाद' यह याद दिलाता रहता है कि हम क्या-क्या भूलते जा रहे हैं.'

जिंदगी से जो चीज़ गायब होती जा रही है, सरल भाषा में उसे गप्प कहते हैं! जब तक हमारे बीच केवल टेलीविजन था, तब भी हमें एक-दूसरे के साथ बाते करने के लिए पर्याप्त समय मिलता था. हम एक-दूसरे के मन को टटोलते रहते थे.
सहज संवाद और संवेदना के साथ एक-दूसरे को ऊर्जा और शक्ति देते रहते थे.
परिवार में सबके बीच क्या-क्या चल रहा है, इसके लिए हमें किसी सर्वे की जरूरत नहीं पड़ती थी. हमारे पास हमारे घर पर ही हर तरह के इलाज मौजूद थे. टेलीविजन से लैपटॉप, मोबाइल तक की यात्रा में हमारा मन निरंतर एकाकी हो रहा है.

यहां सुनें पूरा जीवन संवाद



टेलीविजन हम साथ देखते थे. लैपटॉप ने हमें थोड़ा अकेला किया, लेकिन उसके बाद जब से मोबाइल आया है, हम अकेले होते जा रहे हैं.
जब हम सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं, तो संवाद कहां से आएगा. जब तक संवाद नहीं आएगा, हम एक-दूसरे के मन तक नहीं पहुंच सकते. जब तक मन को स्पर्श नहीं किया जाएगा, एक दूसरे को सुनना, समझना सरल नहीं है!

पति-पत्नी से लेकर हर रिश्ते में एक-दूसरे को सुनने का अनुशासन तय करना है. मोबाइल को निश्चित समय के लिए खुद से दूर रख हम ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहे हैं, जिसे हासिल करना हमारी पहुंच से बाहर है. दूसरी ओर ऐसा करते हुए हम एक-दूसरे के लिए उस अनुराग को महसूस करेंगे जो हमसे कहीं छिटक गया है. इसलिए, जितना अधिक संभव हो, साथ निभाने के वायदों के बीच एक-दूसरे को सुनने का अभ्यास किया जाए! इससे जीवन में गुणात्मक सुधार आने की संभावना बनी रहेगी!
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: October 20, 2019, 9:30 AM IST
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