#जीवनसंवाद : 'भीतर' और 'बाहर'

जैसे तालाब के कैचमेंट में अतिक्रमण से उसकी सांसें उलझने लगती हैं, उसी तरह मन के कैचमेंट में स्‍नेह, प्रेम और आत्‍मीयता की कमी से ऐसी कठोरता उपजती है, जो भीतर की कोमलता सोख लेती है.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 12:56 PM IST
#जीवनसंवाद : 'भीतर' और 'बाहर'
#जीवनसंवाद : 'भीतर' और 'बाहर'
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 12:56 PM IST
घर पर अनसुलझी समस्या ‘बाहर’ हमारे व्‍यवहार का सबसे बड़ा संकट है. ठीक उसी तरह, जैसे तालाब की परेशानी उसके भीतर बैठी गाद में होती है. जो बाहर से नज़र नहीं आती. तालाबों के कैचमेंट एरिया से कम होते जंगल, पेड़ पौधे धीरे-धीरे उनकी उम्र कम करते जाते हैं. वहां खेती, गांव बसने से मिट्टी का कटाव बढ़ता गया, गाद जमा होने लगी. बसाहटों की गंदगी, जलकुंभी ने उनको खोखला बना दिया. पहले कैचमेंट में घने जंगल का सुरक्षा कवच होने के कारण मिट्टी का कटाव कम था. कटाव कम होने के कारण गाद का जमाव भी कम था. इससे तालाबों की उम्र हजारों बरस होती, पानी भी निर्मल रहता.

बिल्‍कुल यही दशा हमारी है. हम भी भीतर की गाद से इतने उथले होते जा रहे हैं कि मन के कैचमेंट में प्रेम, आत्मीयता, स्‍नेह निरंतर कम होता जा रहा है. अपने प्रति हमारा दृष्टिकोण इतना उपेक्षापूर्ण है, जैसे हम अपने नहीं, दूसरे के हिस्‍से की जिंदगी का किरदार निभा रहे हों. जैसे तालाब के कैचमेंट में अतिक्रमण से उसकी सांसें उलझने लगती हैं, उसी तरह मन के कैचमेंट में स्‍नेह, प्रेम और आत्‍मीयता की कमी से ऐसी कठोरता उपजती है, जो भीतर की कोमलता सोख लेती है. हमें निरंतर शुष्‍क करती जाती है. हमारे भीतर, नमी की ऊष्मा किसी एक को नुकसान नहीं पहुंचाती बल्कि व्यक्ति, व्यक्तियों से अधिक समाज के लिए नकारात्मक होती है.

हम मन से जितने अस्वस्थ होते जाएंगे, बाहर से उससे अधिक बेचैन, दुखी और रूखे बनते जाएंगे. हम जीवन में जहां से उर्जा हासिल करते हैं, उस स्रोत का खयाल रखना होगा. कोई भी रिश्‍ता समय, साथ के स्‍पर्श के बिना नहीं खिल सकता. छोटे से बगीचे से लेकर जंगल तक कहानी असल में हमारी अपनी जिंदगी की ही कहानी है. हम प्रकृति से जितनी दूरी बढ़ाते जाएंगे, हमारी उर्जा के स्रोत उतने ही सूखते जाएंगे. जीवन के लिए स्नेह, आत्मीयता और नमी वैसे ही जरूरी हैं, जैसे हमारे लिए काम करना. नौकरी करना. करियर बनाना.


स्‍वयं से संवाद की दूरी, बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा से हम ऐसी जीवनशैली की ओर निकल गए हैं, जहां सबकुछ केवल हम तक सीमित हो गया है. हमारी दृष्टि में हमारे अतिरिक्‍त किसी के लिए जगह नहीं बची. इससे भी अधि‍क मुश्‍कि‍ल बात यह है कि हम अपनी हैसियत भी दूसरों के माध्‍यम से तय करने लगे हैं. समाज में बाहरी आकर्षण के लिए जोर इतना बढ़ता जा रहा है कि हम तालाब किनारे सजावटी पौधे लगाकर उसे स्‍वच्‍छ करने का स्‍वप्‍न पाल लेते हैं. उसके किनारे पेड़ की जगह शेड लगा देते हैं. खुश होने लगते हैं.

ठीक यही हम अपने साथ कर रहे हैं. हमारा ध्‍यान केवल बाहर पर है. जबकि समस्‍या एकदम भीतरी है. भीतर से स्‍वयं को निखारे बिना बाहर से उसमें कैसे परिवर्तन आएगा. इसलिए दोस्‍तो, परिवार, कामकाजी संबंधों में जब भी उकताहट महसूस हो, बाहर, दूसरों की ओर देखने से पहले भीतर की ओर झांकि‍ए.
आपको सबसे सटीक उत्‍तर वहीं से मिलेंगे. बस, इसके लिए ध्‍यान से सुनना, अपने प्रति ईमानदार होना सबसे पहली, और आखिरी शर्त है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 8, 2019, 12:56 PM IST
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