#जीवनसंवाद: तुम्हारे बिना जीना!

दूसरों के दिए गए सुख और दुख के भरोसे जीवन को दुविधा में डालना मनुष्यता के विरुद्ध अपराध है. अपनी अनुमति के बिना स्वयं को दुखी करने का अधिकार किसी को मत दीजिए!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 13, 2019, 4:38 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 13, 2019, 4:38 PM IST
अहमदाबाद से विनीता पाठक ने हृदयस्पर्शी, भावुक लेकिन जीवन के बहुत निकट साक्षात्कार से जुड़ा ई-मेल लिखा है. वह लिखती हैं, 'अक्सर हम एक-दूसरे के साथ रहने की कसमें खाते हैं. लेकिन जिंदगी के किसी एक मोड़ पर दूसरे साथी से हमेशा के लिए बिछड़ जाने पर कैसे जीना है! इस पर भी कभी बात होनी चाहिए.' सुनने में यह बात थोड़ी विचित्र लग सकती है. लेकिन जीवन का सत्य इससे अनछुआ तो नहीं है. विनीता ने यह बात इसलिए भी लिखी है, क्योंकि उन्होंने अपने प्रिय को कुछ समय पहले खोया है. जिंदगी रातों रात बदल गई जब उन्हें पता चला कि उनके जीवन साथी उनके साथ केवल एक वर्ष तक हैं.

उसके बाद सब कुछ बदल गया. एक-दूसरे से बात करने से लेकर जीवन के लिए नज़रिए तक. जिंदगी कैसी एक झटके में बदल जाती है, विनीता के परिवार से पूछिए. विनीता ने बताया कि उस एक बरस को ऐसे जिया जैसे कोई हर पल की कीमत बेशकीमती हीरे चुका कर दे रहा हो. हम सब किन चीजों में उलझे रहते हैं. इसका अंदाजा कई बार तब होता है, जब हमारे पास समय के अतिरिक्त सब कुछ होता है. 'नाच्यौ बहुत गोपाल' जीवन की कहानी पर लिखी गई मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में से एक है.

#जीवनसंवाद : 'भीतर' और 'बाहर'

अमृतलाल नागर के उपन्यास में जिंदगी से जुड़ा हर फलसफा है. जो जीवन की चुनौतियां से लड़ने में मानिए हीमोग्लोबिन की तरह हमारी मदद कर सकता है. विनीता ने बहुत बड़ी कीमत चुका कर जीवन के ऐसे अनुभव को हासिल किया है, जिसे सामान्य स्थिति में समझना अगर असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल है. यह आसान हो सकता है, बशर्ते हमारा दृष्टिकोण जीवन के प्रति विस्तारित, प्रवाहित, विहंगम हो. अपने जीवन में हम दूसरों को अक्सर बहुत अधिक महत्व देते हैं. स्वयं से भी अधिक! दूसरों के दिए गए सुख और दुख के भरोसे जीवन को दुविधा में डालना मनुष्यता के विरुद्ध अपराध है. अपनी अनुमति के बिना स्वयं को दुखी करने का अधिकार किसी को मत दीजिए!


कुछ समय पहले हमारे एक वरिष्ठ मित्र का जीवन संकट में पड़ गया. मेदांता अस्पताल में उन्हें बताया गया कि उनका समय केवल दो महीने का हो सकता है. यह समय घटकर दो सप्ताह का भी हो सकता है! उस दौरान वह जिस मन:स्थिति से गुजरे. उसके बारे में उन्होंने बाद में बताया कि तब ऐसा लगा कि मानो अगर दो साल मिल जाएं तो क्या बात है. संयोग से खतरा टल गया कई बरस बीत चुके. वह स्वस्थ हैं, लेकिन जीवन के प्रति अब उनका दृष्टिकोण पहले से सर्वथा अलग है.


मैं इस अलग दृष्टिकोण को ही जानने, समझने और जीने का अनुरोध कर रहा हूं. ऐसे ही जीना है जैसे, इसी पल में सब कुछ है. संभव है कि इस तरह जीने से समय के प्रति हमारा व्यवहार पूरी तरह बदल जाए. समय के टुकड़े जो यूं ही फिसल के रहते हैं, मोतियों सरीखे लगेंगे. समय की सघनता बढ़ जाएगी. जीवन में प्रेम की गहराई, अस्मिता की मिठास और अपनेपन की सुगंध बढ़ जाएगी.
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#जीवन संवाद: टूटे हुए रिश्तों का प्रेम!

अपने प्रिय के बिना जीवन की कल्पना की बात से मेरा आशय जीवन में आशंका को बढ़ाना नहीं, यह महसूस करना है कि जिस खयाल से ही हम डर जाते हैं, सामान्य जीवन में उसकी कितनी अवहेलना करते हैं. अपने ही लोगों के बीच अहंकार के कैसे बड़े बड़े आंगन खड़े कर लेते हैं. प्रेम स्वभाव, एहसास और दृष्टिकोण है. इसका आदर कीजिए, इसे गले लगाइए, जीवन को गहराई से जीते हुए उसकी अनिश्चितता पर भी विश्वास कीजिए. इससे जीवन के प्रति हमारी समझ गहरी, आत्मीयता से परिपूर्ण होगी.

 
पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 9, 2019, 8:22 AM IST
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