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#जीवन संवाद : पुराने, गहरे दुख!

#जीवन संवाद : पुराने, गहरे दुख!

अकेले में हम वैसे होते हैं, जैसे होना चाहते! वहां कोई आग्रह नहीं होता. इसलिए हमारा अकेलापन अंतर्मन की सबसे सच्ची झलक, रिपोर्ट है!

हम जीवन से कितने संतुष्ट हैं, इसे मापने का सबसे सही तरीका है, एकांत में हमारा आचरण. अगर आप एकांत में संतुष्ट हैं, खुश और मजे में हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप जीवन से बहुत हद तक संतुष्ट हैं. असल में अकेले में हम वैसे होते हैं, जैसे होना चाहते हैं! वहां कोई आग्रह नहीं होता. इसलिए हमारा अकेलापन अंतर्मन की सच्ची झलक है! अकेलेपन का व्यवहार, स्वयं से किया गया सबसे ईमानदार आचरण होता है. कोई नहीं है, जब हमारे पास तब हम स्वयं से कैसे संवाद करते हैं, इससे मनोदशा की बढ़िया रिपोर्ट मिलती है.

जब मैं छोटा बच्चा था, मेरे पास मेरी समस्याओं का कोई हल नहीं था. हमें ऐसे परिवेश से आते थे जहां पर बच्चों की शादी कभी भी हो सकती थी. ऐसे में मेरा अकेलापन कैसा था? वह असल में वैसा था जैसा मैंने ऊपर लिखा है. जब मैं अकेला होता था तो अक्सर खुद को ऐसे सवालों के बीच पाता था, जो मुझे सबके सामने भी घेरे रहते थे. जैसे-जैसे साहित्य, गांधी के विचारों ने मेरी मदद करनी शुरू की, मेरे अकेलेपन की शक्ल ही बदल गई. मेरा अकेलापन समस्या की समाधान की ओर मुड़ गया.

समय बदला, अकेलेपन में स्वयं के प्रति किया जाने वाला आचरण भी बदल गया. 'डियर ज़िंदगी' जीवन संवाद में अनुभव के स्तर पर लिखा गया प्रत्येक शब्द वह है, जिसे जीवन में जिया गया है. मैं कभी दूसरे के अनुभव के आधार पर अपने विचार नहीं रखता. संभव है कि मेरा अनुभव आपकी कुछ मदद पाए लेकिन असल में वह उतनी ही मदद कर पाएगा, जितनी उसे आप अनुमति देंगे.


यह हुई अकेलेपन की बात. अब देखें कि अकेलापन बनता कैसे है. यह हमारे अवचेतन मन के उस हिस्से से अधिक जुड़ा होता है, जिसका चेतन मन के पास समाधान कम होता है. इसके भी कई रूप हैं. एक बच्चा समस्या से घिरा हुआ है. कोई उसकी बात नहीं समझता, उसे सुनने को माता-पिता तक तैयार नहीं. अपनी ओर से बहुत कोशिश कर रहा है लेकिन नतीजे नहीं दे पा रहा है. तो उसका अकेलापन कैसा होगा, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है.

इसके उलट दूसरा बच्चा जो बहुत अच्छे परिणाम दे रहा है, वह अपनी बात दूसरों तक रख पा रहा है, उसका अकेलापन पहले बच्चे के मुकाबले एकदम अलग होगा! अक्सर होता यह जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ हमारे प्रश्न भी अधूरे छूटते जाते हैं. जैसे बस में बच्चे का किराया तो लिया जाता है, सीट नहीं दी जाती, ठीक वैसे ही माता-पिता उसकी परवरिश तो करते हैं लेकिन उसके प्रश्न अक्सर अनसुलझे रह जाते हैं. उसके कोमल मन पर अनसुलझे सवाल अक्सर बहुत गहरे जख्म छोड़ जाते हैं.

आपने महसूस किया होगा, कुछ युवा अपने माता-पिता के प्रति कठोर, असंवेदनशील होने के साथ अरुचिकर होते हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इसमें बचपन में उन्हें मिला व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण होता है. मेरे मित्र हैं, बहुत ही भले. लेकिन वह किसी भी ऐसी बात पर ध्यान नहीं देते, जिसके लिए पिता उन्हें कहते हैं. इसलिए, क्योंकि बचपन में उन्होंने पिता को भी ऐसा ही करते देखा था. पिता से वह कुछ कहते नहीं, लेकिन अवचेतन में रिश्ते के धागे में इतनी गहरी गठान पड़ी कि उसे अब तक नहीं सुलझाया जा सका. वह गहरी उदासी में हैं. वह कुछ कहते नहीं लेकिन उनके अंतर्मन में गहरी टीस है, अपने बचपन को लेकर. पिता पुत्र के बीच अनकहा मनमुटाव है. इस बारे में बहुत अधिक प्रयास के बाद प्रेम की कोपलें फूट रही हैं. जब मन के घाव गहरे होते हैं, तो उन्हें भरने में वक्त लगता है. बड़ों को तो जो घाव मिलने थे, मिल चुके, आइए कोशिश करें कि बच्चों के लिए अधिक प्रेम वात्सल्य और स्नेह की दुनिया बनाई जा सके.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com

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Tags: Dayashankar mishra, JEEVAN SAMVAD, Life Talk, Motivational Story, दयाशंकर मिश्र

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