#जीवन संवाद : जो पिता चाहते हैं...

बड़ों का आदर कीजिए, सम्मान दीजिए. लेकिन निर्णय स्वयं लीजिए.अनुभव की रोशनी से जीवन को जगमगाने दीजिए, बस इतना ध्यान रहे कि पगडंडी आपकी हो!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 5:22 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 5:22 PM IST
'डियर जिंदगी' जीवन संवाद में सबसे अधिक प्रतिक्रिया हमें रिश्तों के प्रबंधन पर मिलती है. घर में निर्णय प्रक्रिया को लेकर पिता का प्रबल पक्ष कई बार उनका निर्णय बन जाता है. मां का इसलिए नहीं, क्योंकि वह अक्सर संतान के पक्ष में झुक जाती है. हमें इस बारे में लिखने के लिए कहा गया है. इसलिए आज का अंक मोटे तौर पर पिता को समर्पित है.

हर किसी का अपना नजरिया है, जितनी संभावना उसके दूसरे से मेल खाने की है, उतनी ही उससे अलग होने की भी है. कम अभिभावक ऐसे हैं, जो अपने बच्चों से स्वयं को स्वतंत्र रखने में सफल होते हैं. अधिकांश माता-पिता अपनी इच्छा के बोझ से बच्चों के सपने बुनने की कोशिश करते हैं, उसके बाद तमाम उम्र इच्छाओं के चक्रव्यूह में भटकते रहते हैं. होना तो मेरी बेटी/बेटे को यह चाहिए था, लेकिन वह किसी की सुने तब तो! ऐसे बातें हम अक्सर सुनते रहते हैं. तब तक तो सब सुन लिया जाता था जब तक रास्ते सीमित थे, अवसर की गूंज कुछ लोगों तक सिमटी रहती थी. अब इंटरनेट की खिड़की गांव-गांव में खुल रही है, बच्चों के भीतर निर्णय लेने की चाहत नए आकार ले रही है. इसलिए, जो पिता चाहते हैं उसके दिन अब लदने लगे हैं. लेकिन समस्या यह है कि पिता अभी है समझने को तैयार नहीं है कि 'बच्चे उनसे हैं, उनके लिए नहीं'!

मैं अपने संवाद सत्रों में अक्सर इस बात को दोहराता हूं. हमारे देश और अमेरिका- यूरोप के अभिभावकों में मूल अंतर इसी भावना का है. वहां काफी हद तक इस बात से मुक्ति पाई जा चुकी है कि 'पिता क्या चाहते हैं'! कुछ अपवाद हर जगह मिलते हैं लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि अपवाद कभी आदर्श नहीं होते. इसलिए हम सबको निर्णय लेने की प्रक्रिया में मूलभूत बदलाव की जरूरत है.


मैं घर में बच्चों से कभी या नहीं पूछता कि वह क्या बनना चाहते हैं. उनके सपने क्या है, बड़े होकर वह क्या करेंगे. जबकि ऐसे सवाल घरों में अक्सर सुनाई देते हैं. इसकी वजह है कि मैं चाहता हूं कि उनके भीतर 'आरोपित' सपना न पले. वह जो बनना चाहते हैं वह बनें, जो दिशा उनको भली लगे उन दिशाओं की ओर जाएं. लेकिन अपने निर्णय स्वयं करें.नहीं चाहता कि वह कभी कहें कि बनना 'कुछ' और चाहते थे, लेकिन पिता के चलते कुछ और बन गए.

मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि अति सामान्य परिवार में परवरिश के बाद भी मैंने जो कुछ चुना, फैसला किया वह सब मेरा निर्णय है. पिता मेरे सबसे बड़े शिक्षक, प्रेरक और जीवनसाथी हैं. जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण नेल्सन मंडेला के बहुत निकट है. इसके बाद भी निर्णय मैंने अपने ही लिए, वह नहीं जो पिता चाहते हैं! असहमति का अंबार भी हमारे बीच स्नेह, आत्मीयता को इंच भर भी कम नहीं कर सका.


असल में 'जो पिता चाहते हैं' एक बहुत खूबसूरत ढाल है अपने पक्ष में. इसलिए मैं इतने विस्तार से इस पर लिख रहा हूं क्योंकि अक्सर आपके पत्र, ईमेल इसी विषय पर होते हैं कि मैं करना तो बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन कर कुछ नहीं पाता हूं, क्योंकि मेरे और पिता के सपने अलग हैं. बहुत विनम्रता से मैं कहना चाहता हूं कि इस मनोवैज्ञानिक बाधा से आगे बढ़िए. पिता के विचारों का सामना कीजिए. तर्क कीजिए, अपने मन को मजबूत करके वह निर्णय लीजिए जिसके लिए पूरी तरह आप जिम्मेदार हों. पिता, बड़ों का आदर कीजिए, सम्मान दीजिए. लेकिन निर्णय स्वयं लीजिए.अनुभव की रोशनी से जीवन को जगमगाने दीजिए, बस इतना ध्यान रहे कि पगडंडी आपकी हो!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: July 31, 2019, 8:16 AM IST
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