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#जीवन संवाद : आप घर में क्या हैं!

#जीवन संवाद : आप घर में क्या हैं!

घर की चौखट पार करते ही अगर हम अपने 'होने' को भूल सकें, तो इससे बेहतर कुछ नहीं! बच्चों के लिए कोमलता, स्नेह के स्पर्श का यह सबसे सरल माध्यम है.

हम घर के बाहर जिन जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हैं, उनका प्रभाव घर के भीतर जाते वक्त न हो यह कैसे संभव है. लेकिन इस 'प्रभाव' को संतुलित तो किया जा सकता है. आप पुलिस कमिश्नर हैं, जज, प्रोफेसर, शिक्षक, इंजीनियर जो कुछ भी हैं, घर को इससे बहुत अंतर नहीं पड़ता. घर में दाखिल होते वक्त आप किन मनोभावों से चौखट पार कर रहे हैं, सबसे अधिक अंतर इससे ही पड़ता है.

चौखट पार करते ही अगर हम अपने 'होने' को भूल सकें, तो इससे बेहतर कुछ नहीं! बच्चों के लिए कोमलता, स्नेह के स्पर्श का यह सबसे सरल माध्यम है. वह चाय जो आपके होठों की प्रतीक्षा में ठंडी हुई जा रही है, उसके साथ बिताए गए लम्हे इतने अधिक सार्थक होते हैं, इतने अधिक हम अपने को भूलकर घर के भीतर गए होते हैं.

'डियर जिंदगी' जीवन संवाद के सीआईएसएफ के लिए किए गए व्याख्यान में एक शीर्ष अधिकारी ने मुझसे कहा था कि उनके अपने पिता के साथ संबंध कभी सामान्य नहीं रहे. वजह बहुत साफ थी, उनके पिता सेना के बड़े अफसर थे और हर वक्त बच्चों को कड़े अनुशासन में रखने के हिमायती थे. उनके अनुशासन में मुस्कुराने से पहले इजाजत, पिता के साथ वक्त बिताने से पहले 'समय' लेनी जैसी चीजें शामिल थीं. संभव है कि पहली नजर में इसमें कुछ भी अनूठा ना लगे, जब आप इसे छोटे बच्चे की दृष्टि से देखेंगे तो यह बहुत ही व्याकुल करने वाली बात लगेगी. आप कुछ भी हो सकते हैं 'बाहर' की दुनिया के लिए, इसके बदले में आप उनसे 'भीतर' के अधिकार तो नहीं छीन सकते.

हम जो समय घर से बाहर बिताते हैं, उसकी अवधि इतनी अधिक है कि उसका व्यवहार पर असर न हो, यह संभव नहीं. इसलिए, इस प्रभाव को कैसे कम किया जा सकता है, इस पर सोचना होगा. इसके लिए आमतौर पर 'स्विच ऑन स्विच ऑफ थेरेपी' की बात की जाती है. इसका अर्थ हुआ कि घर में प्रवेश करते समय बाहर की चीजों को दिमाग के एक कोने में अगली सुबह के लिए समेट कर रख देना. ऑफिस की बातों को बिजली के बटन की तरह बंद कर देना. हम सब इन बातों को जानते हैं, लेकिन मानते नहीं हैं. ऐसा करने का अभ्यास नहीं करते. हम या तो ऑफिस के वजन को घर में लिए दाखिल होते हैं या फिर हमेशा उसकी चिंता में डूबे रहते हैं. दोनों ही स्थितियां हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती हैं.

बच्चों के लिए ऐसी स्थितियों का सामना करना बहुत मुश्किल होता है. विजय मांजरेकर भारत के दिग्गज बल्लेबाजों में से हैं. उनके बेटे संजय मांजरेकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि पिता का सामना करने से वह हमेशा घबराते रहे. विजय के व्यवहार को लेकर संजय कभी भी सामान्य नहीं हो पाए. जिन लोगों ने संजय मांजरेकर को खेलते हुए देखा है वह उनकी तकनीक की शुद्धता के मुरीद हैं. इन पंक्तियों का लेखक स्वयं भी उनके खेल से बेहद प्रभावित रहा है.


सुनील गावस्कर जैसे विशेषज्ञों ने इस बात को माना है कि संजय तकनीकी जटिलताओं में बहुत अधिक गहरे चले गए जिसका उनके खेल पर अच्छा असर नहीं पड़ा. बहुत संभव है कि वह अपने पिता की तरह तकनीकी दक्षता हासिल करने में जुटे रहे हों. फिलहाल हम संजय के खेल से अधिक उनके व्यवहार, पिता के उन पर प्रभाव की ओर वापस चलते हैं. यहां विजय मांजरेकर का उल्लेख केवल एक संदर्भ के रूप में किया गया है कि आप घर के बाहर चाहे जो हों, लेकिन बच्चों के लिए आपको केवल उनके पिता या माता की भूमिका में होना चाहिए. पेप्सीको की प्रमुख रही इंदिरा नूई ने स्वीकार किया है कि उनकी बेटी को उनसे मिलने के लिए समय लेना होता था. इसका उन्हें बाद में बहुत अफसोस रहा. नूई की बेटी हमें समझा पाएंगी कि उन्होंने अपनी मां की व्यस्तता की कीमत क्या चुकाई है!

इन संदर्भों के माध्यम से केवल इतना ही निवेदन किया जा रहा है कि जितना संभव हो हम अपने घर में सामान्य होने की कोशिश करें. आप बाहर कितने ही प्रभावशाली, लोकप्रिय व्यक्ति क्यों ना हों, अगर आप अपने बच्चों के लिए माता-पिता का प्यार, दुलार उपलब्ध नहीं करा रहे हैं, उनके लिए आप की भूमिका बहुत सीमित हो जाती है.


हमारे बच्चे जिस टीवी और मोबाइल के सहारे बड़े हो रहे हैं, वह उनकी तरह ही धीरे धीरे अमानवीय, असंवेदनशील और रूखे होते जाते हैं. हम सबको एक समाज के रूप में बच्चों को समय न दे पाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है. इसलिए, लाख जतन करिए, लेकिन बच्चों को भरपूर प्रेम, दुलार और आत्मीयता दीजिए. मानवता के लिए यह एक छोटा दिखने वाला सबसे बड़ा काम है.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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Tags: Dayashankar mishra, JEEVAN SAMVAD, Life Talk, Motivational Story, दयाशंकर मिश्र

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