#जीवनसंवाद : जो साथ नहीं हैं! (पहली किश्त)

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 22, 2019, 9:24 AM IST

आज का संवाद उन सभी पुत्र -पुत्री, मित्र, सखा-सखी को समर्पित है, जो साथ हैं. छोड़कर नहीं गए, उसके बाद भी उस स्नेह से दूर हैं, जिसके वह सहज अधिकारी हैं!

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हम किससे अधिक प्रेम करते हैं. जो हमारे साथ हैं उन्हें, या उन्हें जो हमें छोड़ कर चले गए. छोड़कर जाना किसी भी वजह से हो सकता है. यहां इसका अर्थ केवल इतना है कि वह हमारे साथ नहीं रहते. वर्तमान से अधिक हम अतीत के आंगन में टहलते हैं, इसलिए हमें उनकी यादें अक्सर घेरे रहती हैं जो 'चले' गए. जो हमारे पास है, उसे हम अक्सर सामान्य सुलभ मान लेते हैं. जो पास होते हैं, उनकी कमियां भी हमें सहज ही दिखने लगती हैं. इसलिए, उनके प्रति मन में छोटी छोटी बातें गांठ बन कर हमें परेशान करती रहती हैं.

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छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से सरोजिनी त्रिपाठी लिखती हैं, 'मैंने पति के साथ इसी शहर में रहने का निर्णय सास ससुर की देखभाल, उनके साथ रहने के लिए किया. जबकि उनके तीन पुत्र दूसरे अफसर की चाह में बाहर निकल गए. यह हमारा निर्णय था इसलिए हमें इस पर अफसोस तो नहीं है लेकिन दुख है. क्योंकि माता-पिता के साथ रहते हुए भी हम उनकी आत्मीयता के उतने अधिक अधिकारी नहीं है, जितने उन्हें छोड़कर जाने वाले बच्चे हैं. हम साथ रहते हैं तो हमारी खटपट ज्यादा होती है. रोजमर्रा की जिंदगी केवल मीठी बातों से नहीं चलती, उसमें थोड़ी बहुत तकरार सहज है. जबकि जो दूर हैं कभी-कभी आते हैं, उनसे केवल प्रेम के तार ही जुड़े रहते हैं.'

#जीवन संवाद: दुख से प्रेम और सुख!

यह अकेले सरोजिनी के मन की टीस नहीं. घर-घर की कहानी है. यह अकेले परिवार की भी बात नहीं है. परिवार, मित्र, रिश्तेदार और पड़ोसियों तक के विषय में यह बात अनुभव की जा सकती है.
जो चला गया, वह रोज तो मिलता नहीं, इसलिए उसकी कड़वाहट, असहमति के तार धीरे धीरे-धीरे सहज होने लगते हैं. जबकि साथ रहने वाले के साथ ऐसा नहीं हो पाता. उसमें हर दिन की अनबन, असहमति और छोटे-मोटे तनाव शामिल होते रहते हैं. हमारा मन चेतन से अधिक अवचेतन से संचालित है.


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हमें मन के भीतर बैठा वह 'मन' चला रहा है, जो असल में यादों का बैंक, स्मृतियों का संकलन है. जो छोड़ कर चले गए, अवचेतन केवल उनकी जुगाली करता है, उसमें कुछ नया नहीं जुड़ता. इसलिए, चित्त में उनके लिए यथास्थिति बनी रहती है. जबकि दूसरी ओर जो साथ रहते हैं उनके साथ हर दिन कुछ ना कुछ घटता-बढ़ता रहता है.
वैसे तो इसे सहज जीवन प्रक्रिया के तहत देखा जाना चाहिए. लेकिन तुलना के संसार में इसके पहुंचते ही मन के भीतर अंतर्कलह, दुख का जमाव उनके लिए ही शुरू हो जाता है, हम जिनके साथ हैं!

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आज का संवाद उन सभी पुत्र -पुत्री, मित्र, सखा-सखी को समर्पित है, जो साथ हैं. छोड़कर नहीं गए, उसके बाद भी उस स्नेह से दूर हैं, जिसके वह सहज अधिकारी हैं!

(यह जीवन संवाद दो भागों में होगा. पहला भाग आपने पढ़ा. दूसरा भाग कल यानी बुधवार को)

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 20, 2019, 9:34 AM IST
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