#जीवनसंवाद: ईर्ष्या का तनाव!

जीवन के प्रति गहरी आस्‍था से ही ईर्ष्‍या से बचना संभव है. जो आपका है, उससे कैसी ईर्ष्या? जो आपका नहीं, उससे ईर्ष्या क्‍यों? जिसके हासिल में हमारा हिस्‍सा नहीं, उसके लिए मन की कोमल कोशिका को कठोर बनाने का कोई अर्थ नहीं.

News18Hindi
Updated: July 19, 2019, 10:54 AM IST
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आपको किससे ईर्ष्या होती है! सवाल सुनकर वह चौंक गए. तुरंत उनने अपनी ओर से सफाई देते हुए कहा, 'किसी से नहीं. ईर्ष्या की क्‍या बात है.' मैंने उनसे आग्र‍ह किया कि थोड़ा ठहरकर सोचें. वह कुछ दिन बाद लौटे. उन्‍होंने कहा कि वह अपने एक पुराने मित्र को लेकर थोड़े असहज हैं. वह मित्र इन्‍हें बहुत प्रिय हैं. इनके शुभचिंतक भी हैं. बात केवल इतनी है कि दोनों की शिक्षा एक साथ हुई. दोनों अपने रास्‍ते पर निकल पड़े. इनके करियर का आरंभ धमाकेदार रहा. मित्र भी अपनी गति से बढ़ते गए. इस बीच एक दिन खबर आई कि मित्र को इंडस्‍ट्री का सबसे बड़ा ऑफर मिला है, तो सबने मिलकर साथ में जश्‍न मनाया. इस जश्‍न के बीच इनको लगा कि वह तो अचानक से पीछे छूट गए हैं.

यह बहुत स्‍वाभाविक है. बहुत कम लोग जीवन में इससे बच पाते हैं. ईर्ष्या हमेशा किसी दूर-दराज के व्‍यक्ति से हो जरूरी नहीं. जहां कहीं तुलना का भाव गहरा होता है, ईर्ष्या की काई वहां जमने लगती है. ऐसे समय में जब मिलना निरंतर कम होता जा रहा है. हम केवल मोबाइल, वॉट्सऐप, चैट के सहारे जीवन की नाव गहरे संघर्ष में नहीं पार लगा सकते.

ईर्ष्या वहीं से जन्‍म कहां से लेती है, जहां से परस्‍पर प्रेम कम होता है. कहां एक दूसरे के साथ से अधिक हमारा अहंकार जन्‍म लेता है. जब तक सब हमारा है, हम सबके हैं. यह विचार परिवार, समाज का केंद्रीय भाव था. तब तक हम कितने कम में लेकिन कितनी शांति से गुजारा कर रहे थे. हमारे आर्थिक रूप से सक्षम होते जाने और जीवन में तनाव बढ़ने के बीच सीधा संबंध है. अगर हम अपनी महत्‍वाकांक्षा को ठीक से नहीं संभल रहे हैं तो यह बाजार का नहीं, हमारा संकट है.

जीवन के प्रति गहरी आस्‍था से ही ईर्ष्‍या से बचना संभव है. जो आपका है, उससे कैसी

ईर्ष्या, जो आपका नहीं है, इससे ईर्ष्या क्‍यों. जिसके हासिल में आपका हिस्‍सा नहीं, उसके लिए मन की कोमल कोशिका को कठोर बनाने का कोई अर्थ नहीं.


एक छोटी सी कहानी. यह कहानी मैंने उनसे भी साझा की थी. जिनके साथ ईर्ष्या पर संवाद आरंभ हुआ था.  एक साधु गर्मियों में गांव में उपदेश दे रहे थे. उनकी बात सुनी तो ध्‍यान से जा रही थी, लेकिन वह महसूस कर रहे थे कि ‘गुन’ कोई नहीं रहा, सब केवल सुन रहे हैं. एक दिन उन्‍होंने कहा, कल से सब एक दर्जन आलू लेकर आएं. हर दिन कपड़े की थैली में. शर्त यह कि हर दिन आलू वही होने चाहि‍ए. दो दिन तक तो सब ठीक रहा, लेकिन अगले दिन से आलू लेकर आना मुश्किल होने लगा. कपड़े की थैली में रखने के कारण आलू सड़ने लगे. उनको अपने साथ लेकर आना,उसके साथ बैठे रहना. फिर उनको लेकर जाना. भक्‍तों को साधु की बात निभाना मुश्किल होने लगा.

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आखिर पांचवे दिन एक भक्‍त ने कह दिया, प्रभु और कोई आदेश हो तो कहें. आलू सड़ गए हैं, उनके साथ हर दिन यहां आना मुश्किल होता जा रहा है. साधु ने मुस्‍कुराते हुए कहा. जाइए, सब अपने आलू को दूर कहीं सही जगह रख आइए. कुछ देर में वह वहां प्रसन्‍नता से लौटे. सबके चेहरे खिले थे.

साधु ने अपनी बात समाप्‍त करते हुए कहा, 'पांच दिन के सड़े आलू अपने पास रखना मुश्किल हो रहा था. एक दूसरे की वह बातें जो हमें चुभती हैं. पीड़ा देती हैं. जिनसे मन जलता रहा है. कब तक मन में रखे रहोगे! स्‍वयं की मुक्ति का मार्ग दूसरे से होकर नहीं जाता. हमें स्‍वयं से सबसे पहले मुक्ति चाहिए.'

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com

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First published: July 19, 2019, 10:53 AM IST
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