#जीवनसंवाद: वह मेरे जैसा नहीं है!

जीवन संवादः भिन्‍नता में गहरा स्‍नेह, जीवन रहस्‍य है. मन को भिन्‍नता के लिए तत्‍पर कीजिए. रिश्‍तों में उस कोण को खोजिए, जहां रेखाएं आत्‍मीयता के साथ मुड़ सकें.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 5:14 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 5:14 PM IST
उनके विवाह को मुश्किल से दो बरस हुए हैं. सुपरिचित, स्‍वस्‍थ, आर्थिक संकट से दूर दंपति के इस निर्णय से उनके परिवार सहमत नहीं हैं लेकिन वह इन्‍हें शादी तोड़ने से रोक पाने में सक्षम नहीं हैं.

एक-दूसरे के प्रति गहरा अनुराग रखने वाले कैसे कुछ ही दिनों में असंतोष से भर जाते हैं. एक-दूसरे से दूर होने के लिए व्‍याकुल हो जाते हैं. हम ऐसे समय में हैं, जहां पहले युवा मनचाहे विवाह के लिए घरवालों से मिलकर लड़ते हैं, उसके बाद आपस में लड़ते हैं. फिर तलाक के लिए अपने-अपने परिवार से.

अपने प्रिय जल के लिए तरसता पोखर कभी उससे नाराज होकर उसे अपने अंतर्मन से बाहर तो नहीं निकालता. जंगल कितना भी घना क्‍यों न हो, वह रास्‍ता सुझा ही देता है. पहाड़ कितने ही दुर्गम क्‍यों न हों, परखने के बाद पर्वतारोही को जाने देते हैं. केवल मनुष्‍य है, जो निरंतर ह‍ठी होता जा रहा है. आशंका, निराशा, दुविधा से पहले हमारा मन जलता है, उसके बाद उसका असर आत्‍मा को झुलसाता है.


झारखंड के रांची से उदय नचिकेता ने लिखा है कि विवाह के दो बरस बाद वह तलाक लेने जा रहे हैं. यह शादी उदय-अर्चना की पूरी रजामंदी से हुई थी. उदय पेशे से शिक्षक हैं, अर्चना बैंक में क्‍लर्क. दोनों के बीच बहुत सी चीज़ें, बातें एक जैसी थीं. उन्‍हें लगा दोनों एक जैसे हैं. यह हमारा भ्रम है कि हम अपने ही जैसे से जुड़ते हैं. उससे हमारा अनुराग गहरा होता है, जो हमारे जैसा है.

असल में सबसे अधिक लुभावना वह होता है, जो हमसे भिन्‍न है. पहाड़, नदी,जंगल हमें इसीलिए सुहाते हैं, क्‍योंकि हम मैदान में रहते हैं. कभी पहाड़ पर रहनेवालों से पूछिए, उनके मन में क्या है! उनके मन में आपके शहर के लिए वही स्‍नेह है, जो आपके भीतर पर्वत के लिए है.


आकर्षण के मूल में ही भिन्‍नता है. कुछ ऐसा जो मुझमें नहीं है. मैं वैसा दूसरे के भीतर खोजता हूं. इस तरह पसंद, प्रेम असल में वह तत्‍त है, जो दो खोजी मिलकर एक-दूसरे में खोज लेते हैं. संकट तब खड़ा होता है, जब कुछ खोजने को बाकी नहीं रहता. उसके बाद दंपति एक-दूसरे का वह रूप, रवैया, व्‍यवहार देखते हैं, जो उन्‍हें अपेक्षित नहीं था.

यह अपेक्षित न होना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. बात केवल इतनी है कि हम भिन्‍नता को पहले महत्‍व नहीं देते. अगर भिन्‍नता को पहले ही स्‍वीकार कर लिया जाए तो संकट कहां है. लेकिन पहले तो हम एक-दूसरे के ‘लाड़’ के चक्‍कर में डूबे होते हैं, भिन्‍नता को छुपाते रहते हैं. लेकिन कब तक. कभी तो वह सतह पर आएगी ही. भिन्‍नता के जिंदगी में उतरते ही तनाव के काले बादल हमें घेरने लगते हैं.
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अरे! अगर मुझे पहले पता होता, तो मैं इस रिश्‍ते के लिए कभी हां नहीं करता/करती. यह सबसे सामान्‍य वाक्‍य है. टूटते हुए रिश्‍ते के हमसफर का. लेकिन यह एकपक्षीय है. एकतरफा है! इसमें दूसरे की बात शामिल नहीं. जब हम किसी दूसरे के बारे में कुछ अप्रिय कह रहे होते हैं तो असल में अपने बारे में कुछ छुपा रहे होते हैं.

एक-दूसरे के बारे में जानने का अर्थ एक जैसे को जानना नहीं है, बल्कि उसे जानना है, जो भ‍िन्‍न है. उसे समझना है, जो एक-दूसरे की खुशबू से अलग है. जीवन परस्‍पर सहभागिता का नाम है. हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. मुझे जीवनचक्र की कड़ियों पर बड़ा भरोसा है. जिस तरह बादल पानी बरसाते हैं. फि‍र सूरज पानी को भाप बनाकर उड़ा ले जाता है. उसके बाद फि‍र बादल आते हैं. पानी लाते हैं. नदी, जंगल, जीवन भरपूर विविधता के बाद जैसे एक-दूसरे से जुड़े हैं. वैसे ही मनुष्‍य एक-दूसरे से कड़ियों के क्रम से जुडा हुआ है, भरपूर भिन्‍नता, विविधता के बाद भी .

इसलिए, वह मेरा जैसा/जैसी का प्रश्‍न असल में है ही नहीं. प्रश्‍न है, भिन्‍नता के बाद भी उस कोण को खोजना जहां तो मन एक साथ ठहर सकें. भिन्‍नता में गहरा स्‍नेह, जीवन रहस्‍य है. मन को भिन्‍नता के लिए तत्‍पर कीजिए. रिश्‍तों में उस कोण को खोजिए, जहां रेखाएं आत्‍मीयता के साथ मुड़ सकें. असहमति से शत्रुता मत कीजिए. उसे स्‍नेह दीजिए. भिन्‍नता को लाड़ दीजिए. यह जीवन में नए रंग भर देगी.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com

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First published: July 16, 2019, 10:35 AM IST
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