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#जीवन संवाद: कुछ तो रहा होगा...

#जीवन संवाद: कुछ तो रहा होगा...

आज की कहानी हमारे रोजमर्रा के कामकाजी जीवन पर आधारित है. बहुत से पाठकों ने इस बारे में लिखा है, जनसंवाद में भी इसे प्रमुखता से उठाया जाता रहा है.

आज की कहानी हमारे रोजमर्रा के कामकाजी जीवन पर आधारित है. बहुत से पाठकों ने इस बारे में लिखा है, जनसंवाद में भी इसे प्रमुखता से उठाया जाता रहा है.

आज की कहानी हमारे रोजमर्रा के कामकाजी जीवन पर आधारित है. बहुत से पाठकों ने इस बारे में लिखा है, जनसंवाद में भी इसे प्रमुखता से उठाया जाता रहा है.

    ऑफिस हमारी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा है. अगर हम मानकर चलें कि हम 25 वर्ष से 60 वर्ष तक नौकरी करते हैं. अगर हम आठ से 10 घंटे भी ऑफिस में बिता रहे हैं, तो इसके मायने यह हुए कि हम आधी जिंदगी घर के बाहर बिताते हैं. सरकारी नौकरी में रहने वालों के साथ यह सुविधा होती है कि अक्सर उन्हें तय साथियों के साथ यह उम्र बितानी है. तबादले जैसी कुछ बातों को छोड़ दिया जाए तो वह जानते हैं कि उन्हें किन लोगों के बीच रहना है.

    जबकि दूसरी ओर निजी कंपनियों में काम करने वाले लोगों को इससे उलट स्थितियों का सामना करना होता है. यहां एक व्यक्ति को समय-समय पर अनेक कंपनियों में काम करना होता है और वह भी एकदम अलग अलग मिजाज के लोगों के साथ. ऐसे में अक्सर यह सवाल आता है कि मेरा मिजाज/नेचर तो बहुत अच्छा है, लेकिन दूसरों का स्वभाव इसके उलट है, इसलिए काम करने वाले साथियों के साथ संबंध तनावपूर्ण हैं.

    इस बारे में विभिन्न कंपनियों के महत्वपूर्ण पदों पर रहने वाले लोगों के साथ संवाद और मेरे अपने निजी अनुभव का निष्कर्ष यह है कि अगर हम या मान लें कि सामने वाला जो कह रहा है वह किसी परेशानी की वजह से कह रहा होगा. इसलिए कह रहा होगा कि उसके ऊपर दूसरे किसी तरह का दबाव होगा, तो बहुत हद तक तनाव को टाला जा सकता है.

    मिसाल के लिए एक छोटा सा किस्सा आपके साथ साझा कर रहा हूं...

    एक आईटी कंपनी में काम करने वाले सीनियर मैनेजर राजेश आहूजा ने अपना एक किस्सा हमारे साथ शेयर किया है. उन्होंने बताया कि वह जैसे ही एक नई कंपनी में पहुंचे, वहां काम करने वाले एक युवा साथी ने कहा कि 15 दिन की छुट्टी चाहिए. राजेश के पास वहां पहुंचकर अपने आपको साबित करने जैसी स्थितियां थीं. उन्होंने उस युवा साथी का आवेदन यह कहकर लौटा दिया कि अभी संभव नहीं है. उस साथी ने कहा कि यह बहुत ही निजी मामला है, इसलिए वह इसके बारे में उन्हें बहुत कुछ नहीं बता सकते, लेकिन इतना जरूर है कि उनकी बात में सच्चाई है और वह अपने काम की भरपाई लौटने के बाद 100 फीसदी कर देंगे. लेकिन राजेश उनकी बात से एकदम सहमत नहीं थे. उन्होंने उससे कहा कि या तो वह काम करें या छुट्टी लेकर, इस्तीफा दे दें. दोनों में से एक विकल्प चुनना होगा.

    दोनों के बीच तनाव काफी बढ़ गया. अंततः साथी ने इस्तीफा देने का मन बना लिया. इसी बीच एक दिन राजेश को कहीं से यह जानकारी मिली कि उस युवा साथी ने छुट्टियों का आवेदन इसलिए किया है ताकि वह अपने तलाक संबंधी मामले को स्थाई रूप से हल कर सके. बहुत दिन से अटका हुआ है और अब उसके ऊपर कानूनी और सामाजिक दबाव इतना अधिक है कि उसे इसे किसी भी स्थिति में खत्म करना है. संयोग देखिए कि जिस युवती से उस युवा साथी का तलाक होना है उसे भी कहीं से राजेश जानते थे. उन्होंने खुद उस युवती से कहा था कि वह ऐसे रिश्ते से बाहर निकलें, जहां उन्हें घुटन महसूस हो रही है. तब उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस रिश्ते की कड़ी उनसे इस रूप में जुड़ेगी.

    जैसे ही उन्हें यह बात पता चली उन्होंने उस युवा साथी की छुट्टियां मंजूर कर दीं. उन्हें यह कहते हुए कि अगर उन्होंने पूरी बात उन्हें पहले बताई होती तो इतना तनाव न हुआ होता. साथी ने भी अपनी गलती मानी, लेकिन साथ ही कहा कि सर, इतने कम समय में जिंदगी की बेहद उलझी गुत्थी को दूसरे के सामने रखना आसान नहीं होता. उन्हें छुट्टी मिल गई. वह अपने जीवन के कठिन मोड़ को पीछे छोड़ नई राह पर निकल पड़े.


    यहां तनाव इसलिए कम हुआ, क्योंकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को समझा. उस पक्ष में जोकि सबल था. तनाव का अधिकांश हिस्सा उस ओर से ही नियंत्रित होता है जिसके पास शक्तियां अधिक होती हैं.

    इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे की कोई जिम्मेदारी नहीं है, लेकिन अनुभव यही कहता है कि तनाव ऊपर से नीचे की ओर आता है. इसी कड़ी में नियंत्रित भी होता है. लेकिन एक चीज के लिए हमें इस कहानी में थोड़ा रुकना चाहिए. जब तक राजेश आहूजा का एक छोर उनसे नहीं जुड़ा था, उनके मन में उदारता की लहर नहीं आई.

    उनके मन में प्रेम और स्नेह तब अधिक आया जब कहानी का एक किरदार उनसे जुड़ा हुआ मिला.

    यही एक चीज है, जहां आकर हमें अपने सोचने-समझने और व्यवहार करने के बारे में अधिक विचार करने की जरूरत है. स्थितियां तो वैसी ही रहीं, लेकिन राजेश छुट्टियों के लिए क्यों राजी हो गए.

    क्योंकि उन्हें लगा कि मामले में सच्चाई है, और इसका हल न होने पर कहीं न कहीं उनके ऊपर एक नैतिक दबाव रहता.

    इसके बाद भी मूल बात यह है कि राजेश ने जैसे ही इस किस्से का सिरा अपने से जुड़ा हुआ पाया उनकी भावनाएं बदल गईं. सबसे ज्यादा यही तो करना है कि जब कोई कह रहा है कि उसे किसी ऐसी मदद की जरूरत है जो कि सामान्य नहीं है तो हमें थोड़ा यकीन तो करना ही होगा.

    हमें यह मानना ही चाहिए/मानना ही होगा कि कुछ तो वजह है जिससे हमारे किसी साथी का व्यवहार कुछ गड़बड़ है. कोई भी व्यक्ति कभी बुरा नहीं होता. जानबूझकर बुरा नहीं बनना चाहता. लेकिन उसकी अपनी जिंदगी के हजारों आयाम होते हैं. हजारों ख्वाहिशें होती हैं, मुश्किलें होती हैं जिनसे उसे पार पाना होता है और इसके साथ ही नौकरी भी करनी होती है.

    हमें उस उदार भावना को अधिक से अधिक अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना है, जिसका हम केवल अपने परिचितों के लिए उपयोग करते हैं. परिचित-अपरिचित का भेद जैसे ही मिटेगा जीवन की बहुत सारी मुश्किल धीरे धीरे आसान हो जाएंगी.

    पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
    Network18
    एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
    सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
    ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
    अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
    (https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)


    ये भी पढ़ें : #जीवनसंवाद: वह मेरे जैसा नहीं है!

    Tags: Dayashankar mishra, Dear Zindagi, Effect on your life, JEEVAN SAMVAD, Life Talk, Lifestyle, Motivational Story

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