#जीवन संवाद: हमारे 'तिनके' कहां गए!

'तिनकों' का ख्याल रखना, तब जब हवा के झोंके उन्हें तितर-बितर कर रहे हों, बहुत जरूरी है, क्योंकि जब आप डूब रहे थे, क्योंकि जब आप डूब रहे होंगे, तो केवल वही होंगे जो सबसे पहले आप तक पहुंच पाएंगे!

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 13, 2019, 4:32 PM IST
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बचपन से हम यह मुहावरा सुनते आए हैं, 'डूबते को तिनके का सहारा'. जिंदगी की पाठशाला में हम कितने अपनेपन और आत्मीयता से प्रवेश करते हैंलेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैंजीवन का खारापन बाल सुलभ चंचलतासरलता और मिठास पर हावी होता जाता है! ऐसा उन'तिनकोंकी कमी की वजह से हो रहा हैजो डूबने से अक्सर बचाया करते थे!

ऐसे तिनके हमारे जीवन में कभी न कभी किसी न किसी रूप में आए ही होंगे. ज़रादो मिनट सबकुछ भूलकर उनको याद तो करिए. अचानक से लगेगा जिंदगी में अब तक कितने ही भले लोग हमें मिले हैं. कौन कौन थे यह लोग न जाने किन किन दिशाओं से आए थे! मेरे पिता परिवार में किसी की मदद के प्रस्ताव को ठुकराए जाने पर अक्सर कहते हैं कि भले ही किसी एक ने गलती की होलेकिन उसकी सजा दूसरे की मदद रोककर नहीं दी जा सकती.

उनके ऐसा कहने के पीछे इक छोटी-सी कहानी है. कोई चालीस बरस पहले रीवा से भोपाल आने वाली बस में बैठने के लिए उनके पास दो रुपए कम पड़ गए थे. तब न जाने कहां से मदद का एक 'तिनकाआया! उसने उन्हें वह रकम दे दी. तब के दो रुपए को आज का कितना माना जाए,यह हिसाब मैं आप पर छोड़ता हूं. क्योंकि हमारे परिवार के लिए इस रकम का अंदाजा लगाना संभव नहीं. पिताजी बड़ी मुश्किलों से उस बस स्टैंड तक पहुंचे थेवह बस छूट जातीतो बहुत संभव है आप इस लेखक से आज इस तरह मिल नहीं रहे होते. उसे पढ़ और सुन नहीं रहे होते. मैं अपनी पूरी जिंदगी उस दो रुपए को याद रखना चाहता हूं!



वह सज्जन पिताजी को दोबारा नहीं मिले! मदद करके मानो 'तिनकेकी तरह हवा के साथ किसी दूसरे सफर पर निकल गए. मिलेंगे भी नहीं! क्योंकि यह बात टेलीफोनमोबाइलसोशल मीडिया से बहुत पहले की है. तब जब किसी की मदद का हिसाब रखने का चलन नहीं था. उस वक्त जब किसी दुर्घटना का शिकार हो रहे व्यक्ति को बचाने पर बल दिया जाता था. हम मतिविहीन होकरदिमाग का नियंत्रण खोकरमानवता भूलकर वीडियो बनाने में नहीं जुटे रहते थे.
विज्ञान हमें सोचने का सर्वोत्तम नजरिया सुलभ कराता है. लेकिन तकनीक! अगर उसे हमने अपने ऊपर हावी होने दिया तो वह 'डूबते को तिनके का सहारातो दूर मानव को गहरे पानी में तेजी से डुबाने का काम करने लगती है. अपने आसपास की सामाजिकता को थोड़ा अतीत में चलकर टटोलते हैं.


टीवी से पहले हमारी दुनिया कैसी थी. हमारे आसपास संवाद कैसा था. टीवी के बाद में कितना कम हुआ! इसके बाद कंप्यूटर आया! जब डेक्सटॉप आया! हम कुछ और अकेले हो गए! उसके बाद जब लैपटॉप आयाअकेलापन बढ़ गया! उसके बाद अब मोबाइल!
आप ध्यान दीजिए! हम अकेले होकर देखनेसोचनेविचारने और निर्णय लेने की ओर बढ़ रहे हैं! तकनीक हमें एक अकेले कोने की ओर धकेल रही है. सोशल मीडिया को इस अर्थ में आप कितना सामाजिक मानेंगे! वह सामूहिकता का भ्रम तो पैदा करती हैलेकिन उसमें जीवन की समग्रता नहीं हैएहसास तो पैदा करती है लेकिन उसमें 'बोध 'नहीं है!

कुछ समय पहले एक दुर्घटना में सही सलामत बचने के बाद विचार आयाक्या होता अगर मैं न बचा होता! मुझे लगा जिंदगी न जाने कितने लोगों का शुक्रिया अदा किए बिना खत्म हो गई होती! शिकायत तो ताउम्र रहेगी! लेकिन मोहब्बत! प्रेमस्नेहआदर और सबसे बढ़कर कृतज्ञता!

'तिनकोंका ख्याल रखनातब जब हवा के झोंके उन्हें तितर-बितर कर रहे होंबहुत जरूरी हैक्योंकि जब आप डूब रहे थेक्योंकि जब आप डूब रहे होंगेतो केवल वही होंगे जो सबसे पहले आप तक पहुंच पाएंगे!

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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